मुद्रास्फीति तथा अपस्फीति क्या होती है? | Types of inflation in Hindi

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इस पोस्ट के माध्यम से हम मुद्रास्फीति के प्रकार (Types of inflation) तथा मुद्रास्फीति मुद्रास्फीति तथा अपस्फीति क्या होती है? इसके बारे में जानेंगे|

यदि आप बिजनेस के बारे में जानना चाहते हैं तो आपको मुद्रास्फीति तथा अपस्फीति तथा “types of inflation” के बारे में अवश्य ही पता होना चाहिए|

सबसे पहले हम मुद्रास्फीति की परिभाषा एवं अर्थ से शुरुआत करते हैं| 

इसके बाद types of inflation के बारे में जानेंगे| 

मुद्रास्फीति की परिभाषा एवं अर्थ 

यदि वस्तुओं के दाम लगातार लंबे समय तक बढ़ते चले जाएं| ऐसी स्थिति में लोगों को वस्तुओं को खरीदने के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी| ऐसी स्थिति को ही inflation (मुद्रास्फीति) की स्थिति कहते हैं| 

मुद्रास्फीति का अर्थ:  “मुद्रास्फीति दो शब्दों मुद्रा + स्फीति से मिलकर बना है| यहां पर मुद्रा का अर्थ – “मुद्रा, धन, कैश, पैसे, रोकड़, नक़द धन” से है तथा स्फीति का अर्थ – “ वृद्धि, विस्तार, बढ़ती, अधिकता, समृद्धि” से है| यानी कि सीधे शब्दों में समझा जाए तो वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमत बढ़ने को मुद्रास्फीति कहते हैं|”

  • जब वस्तु के सामान्य दामों में लगातार बढ़ोतरी होती रहती है तब समझ लीजिए कि inflation (मुद्रास्फीति) की बात हो रही है|
  • इसका परिणाम यह होता है कि वस्तुओं को खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, इस कारण से लोगों की वस्तुओं को खरीदने की शक्ति घटती जाती है| 
  • अर्थशास्त्रियों के मुताबिक  वस्तुओं के दामों में 5% की वृद्धि जायज है| यदि यह 5% की वृद्धि लंबे समय तक भी चलती रहेगी तो उसे inflation (मुद्रास्फीति) नहीं कहा जाएगा|

मुद्रास्फीति की परिभाषा: “वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य में होने वाली स्थाई व अस्थाई वृद्धि को मुद्रास्फीति कहा जाता है|”

मुद्रास्फीति के प्रकार (Types of inflation)

आइए दोस्तों, अब बात करते हैं मुद्रास्फीति के प्रकार (Types of inflation) कौन से हैं? आपके मन में एक प्रश्न अवश्य ही होता होगा कि आखिर! वस्तुओं के दाम क्यों बढ़ते हैं? तो आइए! इसे समझने का प्रयत्न करते हैं| 

  • Demand-pull inflation (मांग मुद्रास्फीति)
  • Cost-push inflation (मूल्य – बढ़ोत्तरी मुद्रास्फ़ीति)
  • Stagflation (मुद्रास्फीतिजनित मंदी)

Demand-pull inflation क्या होता है? 

इसके पीछे का मुख्य कारण मांग (Demand) तथा आपूर्ति (supply) में अंतर होना होता है|

यानी कि यदि इसे सरल शब्दों में समझें तो किसी वस्तु की प्रोडक्शन कम होती है तथा उसको खरीदने वाले ज्यादा होते हैं, तो उस वस्तु के दाम बढ़ना तय है| 

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बाजार से प्रतिस्पर्धा (Competition) खत्म हो जाती है| एक दुकानदार के पास माल कम है तथा ग्राहक ज्यादा है तो निश्चित तौर पर ही वह उसको उच्च कीमत पर बेचेगा|

पर यदि यहां पर हम इसे उल्टा कर दे तो निश्चित तौर पर ही दो दुकानदारों के मध्य प्रतिस्पर्धा होने से वह वस्तु को कम दाम पर बेचने का प्रयास करेंगे| 

  • बाजार में flow of money  तथा flow of goods का एक दूसरे पर प्रभाव डालने के कारण है इसकी उत्पत्ति हुई है|
  • जब वस्तु तथा सेवाओं की मांग अधिक होती है और उसकी आपूर्ति में कमी होती है तो  इसी वजह से मांग उसकी कीमतों को ऊपर चढ़ा देती है| इसे ही Demand-pull inflation कहते हैं| 
  • इस कारण से खर्चों में बढ़ोतरी हो जाती है| लोग ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए तैयार होते हैं इसी कारण से इसका नाम पड़ गया Demand-pull inflation
  • दूसरे शब्दों में यदि मैं समझाऊं तो, वस्तुओं तथा सेवाओं की पूर्ति (Supply) कम हो रही है तथा उनकी मांग (Demand) अधिक होती है तो, इस वजह से वस्तुओं के दाम में बढ़ोतरी हो जाती है|

यह बहुत ही मुख्य मुद्रास्फीति का प्रकार (types of inflation) है|

Cost-push inflation क्या होता है?

यदि किसी एक विशेष प्रोडक्ट की कीमतों में वृद्धि हो जाती है तो, उस बढ़ी हुई कीमत का प्रभाव उससे बनने वाले सभी उत्पादों पर पड़ता है| 

इस मुद्रास्फीति के प्रकार (types of inflation) को समझने के लिए हम एक उदाहरण की मदद लेंगे|

उदाहरण: यदि प्लास्टिक का दाना जो कि एक प्लास्टिक बनाने का कच्चा पदार्थ है, इसकी कीमतों में वृद्धि हो जाती है तो, प्लास्टिक से बनने वाले सभी उत्पादों की कीमत में वृद्धि होना निश्चित है| 

यानी कि जब किसी एक विशेष वस्तु के दाम बढ़ने से एक श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) होती है तो,  यह कहा जाता है कि Cost के कारण inflation  हो रहा है| 

यानी कि Cost की वजह से कीमतें बढ़ रही हैं| जब यह प्रक्रिया लगातार लंबे समय तक चलती रहती है तो, कीमतों के कारण मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी का कारण मानते हैं|

इसी वजह से इसे Cost-push inflation कहते हैं| 

  • किसी विशेष उत्पाद की कीमतों में वृद्धि होती है तथा इसके प्रभाव से इससे बनने वाले सभी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है| 
  • Cost-push inflation का परिणाम यह होता है कि उत्पादन के कारणों में वृद्धि होती चली जाती है| जैसे: कि कर्मचारी उत्पादन बढ़ाने के बजाय अपनी तनख्वा बढ़ाने की मांग करने लगे| यह बढ़ी हुई कीमत उत्पादन करता अपने प्रोडक्ट में जोड़ देता है| इस वजह से कीमतों में वृद्धि हो जाती है| 
  • किसी इंडस्ट्री में यदि एक प्रोडक्ट महंगा हो जाता है तो, निश्चित तौर पर ही इस इंडस्ट्री में श्रंखला अभिक्रिया (chain reaction) जरूर होगी|  इसके  परिणाम स्वरुप यह निश्चित तौर पर दूसरे इंडस्ट्रीज को भी प्रभावित अवश्य करेगा| 
  • जब लोहे की कीमतों में वृद्धि हो जाती है तो इसके परिणाम स्वरूप जहां पर भी लोहे तथा लोहे से बनी किसी भी वस्तु का इस्तेमाल होता है, तो वहां पर किमत निश्चित तौर पर ही बढ़ जाएंगी, क्योंकि परिणाम स्वरूप सभी मशीनरी, ट्रक, इत्यादि की कीमतों में भी वृद्धि हो जाएगी| 
  • लोगों के घरेलू खर्चों में भी बढ़ोतरी हो जाती है, जिस कारण से कर्मचारी फिर से अपनी तनख्वा बढ़ाने की डिमांड करते हैं| अब! जाहिर सी बात है कि यह बढ़ी हुई तनख्वाह कोई भी मालिक अपनी जेब से नहीं देगा| वह फिर से उत्पादों की कीमत में वृद्धि कर देगा| जिसका नतीजा होगा की महंगाई और बढ़ जाएगी| 
  • अक्सर डिमांड पुल इन्फ्लेशन, कॉस्ट पुश इन्फ्लेशन से पहले आ जाता है।
  • जब डिमांड पुल इन्फ्लेशन आता है तो यह विभिन्न उत्पादक क्षेत्रों को प्रभावित करता है, इसके परिणाम स्वरूप कीमतों में वृद्धि हो जाती है| एक वस्तु के प्रभाव से दूसरी वस्तु प्रभावित होती है, नतीजतन (As a result) कीमतों में वृद्धि हो जाती है| 

Stagflation क्या होता है?

Stagflation meaning in Hindi: “मुद्रास्फीतिजनित मंदी” यानि की मुद्रास्फीति के कारण पैदा होने वाली मंदी को स्टैग्फ्लैशन कहते हैं|

स्टैगफ्लेशन Demand-pull inflation तथा Cost-push inflation मिश्रित स्वरूप होता है|

इन दोनों कारकों के कारण ही Stagflation की उत्पत्ति होती है|

यानि की मुद्रास्फीति का यह प्रकार (types of inflation) इन दोनों कारकों के कारण ही उत्पन्न होता है|

विकसित तथा अर्ध-विकसित दोनों प्रकार के देशों में स्टैगफ्लेशन होता है| 

  • इसके परिणाम स्वरूप इकोनामिक ग्रोथ रेट कम हो जाती है| 
  • यदि कर्मचारी तनख्वा बढ़ाने के साथ उत्पादन में भी वृद्धि कर दे तो मुद्रास्फीति (inflation) नहीं होगी, क्योंकि देश की इनकम में भी वृद्धि होती जाती है| 
  • यदि देश की इनकम में वृद्धि नहीं होती तो इकोनामिक ग्रोथ भी नहीं होगी| 
  • यदि मुद्रास्फीति की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता तो यह बेलगाम (hyperinflation) तरीके से बढ़ना शुरू कर देती है| कहीं-कहीं पर 42% से 98% तक प्रतिवर्ष की वृद्धि देखी गई है| 
  • इसके परिणाम स्वरूप सरकारी ग्रोथ रेट बढ़ाने के उपाय करती रहती है परंतु वह प्रोडक्शन बढ़ाने में विफल हो जाती है| 
  • भारत में Stagflation के कारण इकोनामिक ग्रोथ में बहुत धीमी तरक्की हो रही है या रुकी हुई है| इसकी वजह से सकल राष्ट्रीय उत्पाद (gross national product) में भी बहुत धीमी तरक्की हो रही है या रुकी हुई है या नीचे गिरने लगी है| जब इकोनामिक ग्रोथ तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद मैं बहुत धीमी गति से तरक्की हो रही हो तथा साथ में कीमतों में वृद्धि हो रही हो तो, इसका अर्थ यह है कि Stagflation की शुरुआत हो चुकी है| 
  • भारत वर्ष 1991 में इस से बहुत प्रभावित हुआ था| खाड़ी युद्ध (Gulf war) के कारण कच्चे तेल के दामों में तेजी से वृद्धि हुई थी, इस कारण से भारत बड़ा बजट घाटा (budget deficit) हुआ था| वर्ष 1991 में इकोनामिक ग्रोथ तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि हुई नहीं तथा कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई थी| तब भारत ने Stagflation का अनुभव किया था|
  • भारत में स्टैगफ्लेशन का दौर वर्ष 1991 से वर्ष 1994 तक रहा था|

यदि हम ऊपर दिए कारणों पर काबू कर लें तो stagflation पर काफी अधिक control किया जा सकता है|

उम्मीद करता हूं, आपको मुद्रास्फीति के प्रकार (types of inflation) के विषय में अच्छी तरह समझ में आ गया होगा!

Deflation क्या होता है?

डिफ्लेशन वह स्थिति होती है जिसमें कीमतें गिर रही होती हैं जिसके परिणाम स्वरूप लोगों में वस्तुओं को खरीदने की शक्ति बढ़ जाती है|

अपस्फीति (Deflation) मुद्रास्फीति के ठीक विपरीत होता है|

मुद्रास्फीति (inflation) से अपस्फीति (Deflation) की स्थिति बहुत खतरनाक होती है| इ

समें प्रोडक्शन बहुत अधिक मात्रा में होती है तथा उत्पाद को खरीदने के लिए ग्राहक नहीं होता|

यानी कि सप्लाई बहुत अधिक है तथा डिमांड बिल्कुल ना के बराबर है| ऐसी स्थिति में कंपनियां उत्पादन घटा देती हैं| जब उत्पादन घटता है तो, कर्मचारियों की भी छटनी शुरू हो जाती है| जब कर्मचारियों की छटनी होती है तो, वह बेरोजगार होते चले जाते हैं| परिणाम स्वरूप हर जगह बेरोजगारी फैल जाती है| 

भारत में मुद्रास्फीति के कारण (Causes of inflation in India)

आइए! अब उन कारणों को समझने की कोशिश करते हैं, की भारत में मुद्रास्फीति के क्या कारण हैं| इन्फ्लेशन से हमारा सामान्य जीवन प्रभावित होता है| इसलिए इसे समझना बहुत ही जरूरी है|  बिजनेस के मामले में भी आपको इन्फ्लेशन के बारे में सामान्य ज्ञान होना ही चाहिए| 

भारत में मुद्रास्फीति के बहुत से कारण है? क्योंकि भारत एक अविकसित देश है|

प्रत्येक अविकसित देश में सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत सारा पैसा खर्च करना पड़ता है| 

जैसे: रक्षा, मेडिकल, सड़क, शिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सरकार को पैसा खर्च करना ही पड़ता है| यह पैसा लोगों के पास जाता है| लोगों के पास पैसा जाने के बाद वे वस्तुओं को खरीदना चाहते हैं|

यदि उस समय पर डिमांड तथा सप्लाई में फर्क आ जाए तो, निश्चित तौर पर ही यह मुद्रास्फीति का कारण बन जाएगा| 

सार्वजनिक व्यय में वृद्धि (Increase in public expenditure)

इसमें किसी देश का 40% से अधिक हिस्सा नॉन डेवलपमेंट एक्टिविटीज में खर्च होता है| यानी कि ऐसे क्षेत्रों में खर्च होता है जहां पर किसी भी चीज का उत्पादन नहीं होता|  जैसे की: रक्षा के क्षेत्र में, अब! यहां पर लोगों को पैसा तो मिलता है परंतु किसी भी चीज का उत्पादन नहीं हो रहा, साथ ही साथ यह बहुत ही जरूरी क्षेत्र भी है| 

ऐसी स्थिति में लोगों के हाथ में पैसा आ जाता है| पैसा आने के बाद वह वस्तुओं को खरीदने में अधिक समर्थ हो जाते हैं, परंतु उत्पादन कम होने की वजह से वस्तुओं की डिमांड बढ़ जाती है| इस कारण से भारत में मुद्रास्फीति बढ़ जाती है| 

सरकार जो पैसा खर्च करती है वह टैक्स के माध्यम से इकट्ठा करती है| सरकार के पास जितना टैक्स आता है, खर्चा हमेशा उससे ज्यादा होता है| 

इस कारण से सरकार को इन खर्चों को पूरा करने के लिए कर्जा लेना पड़ता है या फिर सरकार को नोट छापने पड़ते हैं| 

ज्यादा नोट छापने की वजह से मुद्रा की वैल्यू भी गिर जाती है| इस कारण से वित्तीय घाटा बढ़ जाता है|

इसके परिणाम स्वरूप मुद्रास्फीति (inflation) बढ़ जाती है| 

वित्तपोषण घाटा (Deficit financing)

वित्तपोषण घाटे का अर्थ: “इसका अर्थ होता है budget deficit की कमी होना| इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को या तो कर्जा लेना पड़ता है या फिर करेंसी छापनी पड़ती है|”

इस कारण से सरकार को डेवलपमेंट के कामों को कम करना पड़ता है|  जिस कारण से लोगों के हाथ में कम पैसा जाता है| इसका नतीजा यह होता है कि मुद्रास्फीति (inflation) बढ़ जाती है| 

अनिश्चित कृषि विकास (erratic agricultural growth)

भारत एक कृषि प्रधान देश है| इस कारण से भारत मानसून पर निर्भर रहता है|

मानसून की अधिकता एवं कमी दोनों ही इन्फ्लेशन को प्रभावित करते हैं| 

जब कभी ज्यादा बारिश आ जाती है तो बाढ़ आ जाती है, जिससे सारी फसल तबाह हो जाती है|

यदि बारिश नहीं आती तो सूखा पड़ जाता है, इससे भी फसल बर्बाद हो जाती है| 

इस कारण से हमारे देश में अनाज की पूर्ति नहीं हो पाती| इससे मांग बढ़ जाती है और पूर्ति कम हो जाती है| जिसका परिणाम यह होता है कि अनाज के दाम बढ़ जाते हैं| यानी कि दूसरे शब्दों में कहूं तो इन्फ्लेशन बढ़ जाता है| 

कृषि नीति (Agriculture policy)

हमारे देश में किसानों की स्थिति हमेशा दयनीय रही है|  सरकार बड़े-बड़े वादे करती है| मैं ऐसा नहीं कह रहा है कि सरकारें कुछ नहीं करती,  बल्कि मैं यह कह रहा हूं कि सरकारी नीतियों की वजह से कृषि हमेशा प्रभावित होती| ऐसी स्थिति है कि यदि आप कार लेने जाएंगे तो उस पर टैक्स कम है और ट्रैक्टर लेने जाएंगे तो उस पर टैक्स अधिक है| 

किसान को मजबूरी में कृषि के संसाधनों को पूरा करने के लिए कर्जा लेना ही पड़ता है| उसे अपनी फसल का पूरा दाम भी नहीं मिल पाता| 

सरकारी  किसानों की दशा सुधारने के लिए निरंतर कदम उठाती रहती हैं|  

जैसे कि MSP (Minimum support price) फिक्स कर देती है, कर्जा माफ कर देती हैं, कृषि बीमा योजना लेकर आती हैं, किसानों की पेंशन बांध देती है| 

MSP के यदि कहीं पर फायदे हैं तो, कहीं-कहीं पर नुकसान भी हैं| मैं MSP  का समर्थन करता हूं|

 जब मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ जाता है तो अनाज के दामों में वृद्धि होनी तय है| उपभोक्ता को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है|

जिस कारण से  मुद्रास्फीति हो जाती है| 

औद्योगिक उत्पादन (Industrial production)

औद्योगिक उत्पादन की वजह से भी इन्फ्लेशन होता है| उद्योगों में उत्पादन में जिस प्रकार से तेजी आनी चाहिए थी वह नहीं आई है|

सरकार एमएसएमई के माध्यम से उद्योगों का विकास करना चाहती है| 

जब प्रोडक्शन अधिक होती है तो उत्पाद सस्ता पड़ने लगता है, वहीं पर जब उत्पादन कम होता है तो कॉस्टिंग बढ़ जाती है|

 इस कारण से इन्फ्लेशन होता है| 

प्रशासित कीमतें (administered prices)

बहुत सारे ऐसे कच्चे माल हैं, जिनकी कीमतें सरकार द्वारा ही निर्धारित की जाती हैं|

सरकार समय-समय पर इनकी कीमतों में वृद्धि करती रहती है| 

सरकार की निष्फलता (Inefficiency) तथा प्लानिंग में कमी के कारण इन वस्तुओं की कीमतों का आकलन ठीक ढंग से नहीं हो पाता| 

इसका नतीजा यह होता है कि कीमतों में अधिक वृद्धि हो जाती है तथा उपभोक्ता को अपनी जेब से अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है|

इतनी पोस्ट पढ़ने के बाद आप समझ ही गए होगे कि इससे इन्फ्लेशन की समस्या पैदा होगी| 

अन्य कारण 

आयकर (Income tax): आज भी भारत में इनकम टैक्स देने वाले लोग बहुत कम है| सरकार पूरी तरीके से लोगों को इनकम टैक्स के दायरे में नहीं ला पाई| यदि सरकार इनकम टैक्स की चोरी रोकने में सफल हो जाती तो सरकार को बहुत अधिक रेवेन्यू प्राप्त होता|  इसका नतीजा यह होता कि इन्फ्लेशन की दर में कमी आती| 

अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax): जब सरकार इनकम टैक्स की चोरी नहीं रोक पाई तो उसने बहुत सारे अप्रत्यक्ष कर लगा दिए| 

FAQs: मुद्रास्फीति (Inflation)

मुद्रास्फीति क्या होती है?

मुद्रास्फीति (inflation) या महँगाई किसी अर्थव्यवस्था में समय के साथ विभिन्न माल (Goods) तथा सेवाओं (Services) की कीमतों (Prices) में लंबे समय तक होने वाली एक असामान्य बढ़ोतरी को कहा जाता है।

इन्फ्लेशन का क्या मतलब होता है?

inflation meaning in Hindi: “मुद्रास्फीति” जब किसी वस्तु या सेवा का प्राइस बढ़ता है, मतलब goods and services के संपूर्ण प्राइस लंबे समय तक लगातार बढ़ते है, उसको ही इन्फ्लेशन कहते है| किसी एक चीज़ का 10 महीने के अंदर यदि Price (मूल्य) बढ़ जाये तो हम ये नहीं कह सकते की महंगाई बढ़ गई।

स्टैगफ्लेशन की क्या स्थिति होती है?

अर्थशास्त्र में, अंग्रेजी शब्द स्टैगफ्लेशन उस स्थिति को दर्शाता है, जब बेरोजगारी की दर और मुद्रास्फीति दर दोनों ही उच्च रहते हैं। यह अस्थिरता और मुद्रास्फीति दोनों ही अनुचित व्यापक आर्थिक नीतियों (unfair macroeconomic policies) के परिणाम हो सकते हैं।

भारत में मुद्रास्फीति की गणना कौन करता है?

थोकमूल्य सूचकांक : WPI (Wholesale Price Index) भारत में मुद्रास्फीति की गणना करता है|
यह भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला मुद्रास्फीति संकेतक (Inflation Indicator) है। इसे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) के आर्थिक सलाहकार (Office of Economic Adviser) के कार्यालय (office) द्वारा प्रकाशित किया जाता है।

मुद्रास्फीति के मापक कौन कौन से हैं?

1- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक: CPI (Consumer Price Index)
2- थोक मूल्य सूचकांक: WPI (Wholesale Price Index)
3- राष्ट्रीय आय विचलन: NID (National Income Deflation)

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आपने क्या सीखा?

इस पोस्ट के माध्यम से आपने मुद्रास्फीति की परिभाषा एवं अर्थ, मुद्रास्फीति के प्रकार (Types of inflation), Demand-pull inflation क्या होता है?, Cost-push inflation क्या होता है?, Deflation क्या होता है?, भारत में मुद्रास्फीति के कारण (Causes of inflation in India) क्या हैं? के बारे में जाना|

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अगली पोस्ट में फिर मिलेंगे तब तक के लिए नमस्कार 

धन्यवाद

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