मजदूरी भुगतान अधिनियम क्या है? | Payment of wages act in Hindi

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दोस्तों,  बिज़नेस लोक में आपका स्वागत है! आज मैं आपको payment of wages act 1936  से अवगत करवाऊँगा| आप minimum wages के बारे में तो जान ही चुके हैं| अब आपको पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट 1936 के बारे में भी अवश्य ही जान लेना चाहिए| 

यह उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो लोग अपने कर्मचारियों को उनका मेहनताना समय पर अदा नहीं करते| 

What is payment of wages act 1936: पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट 1936 क्या है? 

यह भी भारत का एक लेबर लॉ है| Payment of wages act सन 1936 में पारित हुआ था| 8 मार्च 1937 को यह पूरे भारत में लागू हो गया था| 

जैसा कि इसके नाम से हमें समझ में आता है कि कहीं ना कहीं यह मुद्दा कर्मचारियों की पेमेंट से जुड़ा हुआ  होगा| जभी तो इसमें पेमेंट शब्द का इस्तेमाल किया गया है| 

जी हां, यह बिल्कुल ठीक बात है! 

सबसे पहले एंपलॉयर द्वारा एम्पलाई को पेमेंट देने में क्या-क्या समस्याएं आती थी? उनकी बात कर लेते हैं| 

1- असामयिक (Untimely)

इसके अंतर्गत एंपलॉयर द्वारा एम्पलाई को उसके मेहनताने के भुगतान कि कोई निश्चित तिथि नहीं होती थी| 

2- कटौती (deduction)

इसमें कर्मचारी की तनख्वाह को तरह-तरह के अनुचित (unjustified) फाइन लगाकर काट लिया जाता था और काटते-काटते वह तनख्वाह इतनी थोड़ी रह जाती थी कि उसमें किसी कर्मचारी का घर नहीं चल सकता था| 

3- मजदूरी की गैर-बराबरी (nonuniformity of wages)

किसी को कम वेतन किसी को ज्यादा वेतन यानी कि साधारण शब्दों में कहूं तो एक ही काम के लिए अलग-अलग कर्मचारियों को अलग-अलग वेतन दिया जाता था|

इन्हीं सब समस्याओं के निपटारे के लिए और कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखने के लिए ही सरकार द्वारा payment of wages act 1936 लाया गया था| 

Payment of wages act 1936: समाधान (Solutions)

किसी भी समस्या के हल के लिए सबसे पहले उस समस्या की जड़ को जानना जरूरी है|  जैसा कि आप वेतन का भुगतान करने के अंदर क्या-क्या समस्याएं आती थी इनके बारे में जान चुके हैं|

अब आपको केवल इन्हीं समस्याओं का हल करना है जो कि बहुत ही आसानी से हो जाएगा|  सरकार द्वारा भी ऐसा किया गया|

 आइए देखते हैं!

समय पर भुगतान (Timely payment)

इसके अंतर्गत यह कानून बनाया गया कि मजदूरी की एकरूपता (uniformity of wages) को अनिवार्य कर दिया गया तथा साथ ही साथ एक समय निश्चित करने को कहा गया जिस पर भुगतान करना अनिवार्य  है| 

कटौती (deduction)

इसके अंदर कटौती को तो मान्यता दी गई परंतु केवल वही कटौती हो सकती थी जोकि उचित हो न्यायोचित हो तथा जिसका अधिनियम में वर्णन किया गया हो| 

Payment of wages act Applicable to: पेमेंट ऑफ वेजेस ऐक्ट किस पर पर लागू है?

  1. प्रत्येक कारखाने (Factory)
  2. रेलवे शासन प्रबंध (Railway administration) 
  3. कोई भी औद्योगिक (Any industrial)
  4. अन्य प्रतिष्ठान (Other establishments)
  5. कम से कम तीन महीने की अधिसूचना देकर कोई अन्य प्रतिष्ठान पर भी लागू किया जा सकता है (Any other establishment by giving notification of at least three months)
  6. जहां एक विशेष वेतन अवधि का वेतन 6500 रुपये प्रति माह से कम है (where the salary of a particular wage period is less than 6500 rupees per month) 

नोट:– इस वेतन को NSSO द्वारा प्रत्येक 5 साल में या उससे पहले जरूरत पड़ने पर – उपभोक्ता व्यय स्तर के अनुसार (according to consumer expenditure level) इसे  संशोधित किया जाता है| 

अब नए संशोधन के अनुसार यह वेतन राशि 10000  रुपए कर दी गई है| 

अन्य प्रतिष्ठान (Other establishments) में कौन सी इंडस्ट्रीज़ आएंगी?

आइए थोड़ा सा यह भी जान लेते हैं कि अन्य प्रतिष्ठानों में कौन-कौन सी इंडस्ट्री आएगी जिन पर Payment of wages act 1936 लागू होगा? 

परिवहन (Transport)

  1. ट्राम सर्विसेज
  2. मोटर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज “नोट:- यह इन सभी स्थितियों में लागू होगी- चाहे वह पसेंजर को लेकर जा रही हो,  चाहे वह कुछ सामान लेकर जा रही हो  या फिर वह दोनों काम कर रही हो|”
  3. एयर ट्रांसपोर्ट सर्विस “नोट:- नौसेना,वायु सेना तथा सेना के जहाज़ों पर यह लागू नहीं होगा|”
  4. बंदरगाह पर काम करने वाले कर्मचारियों पर यह अधिनियम लागू होगा| 
  5. अंतर्देशीय जहाज (inland vessels)
  6. उत्खनन (quarrying)
  7. तेल निकालने वाले क्षेत्रों (Oil field)
  8. वृक्षारोपण (Plantation)
  9. किसी भी प्रकार की कार्यशाला (Workshop)
  10. भवन निर्माण
  11. उन्नति (Development)
  12. बिजली सप्लाई (बिजली पैदा करना, बिजली का वितरण करना, हस्तांतरण करना)
  13.  पानी की सप्लाई
  14.  प्रकृति के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित (Notified) किए गए सभी संस्थान| 

Payment of wages act के अनुसार उल्लंघन करने पर कौन जिम्मेदार होगा?

सेक्शन 3 के अंतर्गत बताया गया है कि पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट 1936 का उल्लंघन करने पर कौन जिम्मेदार होगा? 

आइए देखते हैं!

Factories (कारखाना)

कारखाने में मैनेजर जिम्मेदार होगा| नोट:- फ़ैक्टरी एक्ट में मैनेजर की परिभाषा दी गई है| 

Railways (रेलवे)

रेलवे में जो भी व्यक्ति स्थानीय क्षेत्र में इस कार्य को करने के लिए नामित होगा| 

Industrial / Other establishment (औद्योगिक / अन्य प्रतिष्ठान)

जिस व्यक्ति को वेतन देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है वही व्यक्ति पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट में जिम्मेदार होगा| 

Contractor (ठेकेदार)

वह व्यक्ति जो ठेकेदार द्वारा वेतन देने के लिए चुना गया होगा| 

Any other case (कोई और मामला)

जिस व्यक्ति को वेतन देने के लिए चुना गया होगा वही व्यक्ति हर मामले में पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट में जिम्मेदार होगा| 

Fixation of wages Period

सेक्शन 4 के अनुसार बताया गया है कि जो व्यक्ति वेतन देने के लिए जिम्मेदार होंगे वही व्यक्ति वेतन अवधि का निर्धारण (fixation of wage period) भी करेंगे| 

नोट:-Payment of wages act 1936 के अनुसार  वेतन देने की अधिकतम सीमा 1 महीना है| यानि कि 1 महीने से ज्यादा की सैलरी रोकने का उन्हें अधिकार नहीं है|

इस बात को और अच्छी तरह समझने के लिए मैं कुछ उदाहरण देता हूं|

  • प्रत्येक रोज वेतन दिया जा सकता है|
  • हफ्ते में वेतन दिया जा सकता है|
  • 15 दिन में वेतन दिया जा सकता है|
  • 20 दिन में वेतन दिया जा सकता है| 

परंतु 1 महीने से ऊपर की अवधि में वेतन देना अधिनियम का उल्लंघन होता है| 

Amendments in the payment of wages act 1936: In Hindi

जैसा कि आप अब तक इस पोस्ट को पढ़ने के उपरांत यह जान चुके हैं कि पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट 1936 बनाने का मुख्य मकसद  थे: –  वर्कर्स को समय पर सैलरी मिले,  एक समान सैलरी मिले, वेतन में अनुचित कटौती न की जाए

Wage ceiling enhancement

वेज सीलिंग राज्य द्वारा लागू की गई सीमा है कि कोई व्यक्ति कितनी आय अर्जित कर सकता है। यह एक विशेष वेतन कोष्ठक (Bracket) के अंदर संभव सबसे अधिक वेतन है। वेतन ब्रैकेट किसी विशेष व्यवसाय के लिए भुगतान सीमा है। वेज सीलिंग को अधिकतम वेतन के रूप में भी जाना जाता है।

  • केंद्र सरकार द्वारा  वेज सीलिंग की सीमा को बढ़ा दिया गया है| 
  • इसे 18000 से बढ़ाकर ₹24000 पर मंथ कर दिया गया है|  यह 29/08/2017  से लागू होगी| 

इस सीमा को बढ़ाने से ₹24000 महीना कमाने वाले वर्कर भी इसके अंतर्गत आ गए| 

Making payment of wages

इस संशोधन के बाद एंपलॉयर अपने एम्पलाई को इन 3 तरीके से वेतन का भुगतान कर सकता है|

  1. नकद भुगतान  “नोट:- यथोचित सरकार ने इस पर प्रतिबंध भी लगा दिया है|”
  2. चेक से भुगतान
  3. ऑनलाइन बैंकिंग मनी ट्रांसफर 

Appropriate government power

अब यह बहुत समझने वाली बात है क्योंकि केंद्र सरकार ने नगर भुगतान को मंजूरी दे दी थी परंतु यथोचित सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया|

प्रतिबंध लगाने का मुख्य मकसद यह था कि यह कैसे पता चलेगा कि employer ने employee को कितना वेतन दिया है?

एंपलॉयर वेतन देने में बहुत ज्यादा धांधली करते थे इसी से बचने के लिए नगद वेतन भुगतान को प्रतिबंधित कर दिया गया है|

नियम के उल्लंघन में क्या सजा या जुर्माना हो सकता है?

यदि मजदूरी के भुगतान में देरी हो जाती है, गलत प्रकार की कटौतियां कर ली गई हैं (जो न्यायोचित हो तथा जिसका अधिनियम में वर्णन किया गया हो- इन्हे छोड़कर) तो नियमों के उल्लंघन के लिए जुर्माने का प्रावधान है। यह जुर्माना 1000 रुपये तक हो सकता है।

जिस वर्कर का नुकसान हुआ हो उसे भी हर्जाना भी मिल सकता है यह हर्जाना गलत कटौती के दस गुने तक हो सकता है। नोटिस आदि न देने पर 200 रुपये का जुर्माना भी हो सकता है।

सरकार किसी ऐसे पदाधिकारी की नियुक्ति करती है जो नियमों के उल्लंघन की शिकायतों को सुनता है तथा शिकायतें सुनकर उन पर निर्णय करेगा और दंड भी देगा।

निष्कर्ष

दोस्तों,  

हमें थोड़ी मानवता भी दिखानी चाहिए|  हमें सोच कर चलना चाहिए कि यह जो मेरे पास काम कर रहा है यह भी मेरे परिवार का एक हिस्सा ही है|  इसकी जो फैमिली है उसका ध्यान रखना भी मेरा फर्ज है|

आशा करता हूं आप हमेशा अपने कर्मचारियों को समय पर भुगतान अवश्य करेंगे| 

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आपने क्या सीखा?

इस पोस्ट के द्वारा आपने Payment of wages act 1936 तथा Amendment payment of wages act 1936 के बारे में सीखा|

पूरा पढ़ने के लिए धन्यवाद

उम्मीद करता हूं आपको मेरी यह पोस्ट पसंद आई होगी|  मैं नवीन कुमार इसी तरह बिज़नेस के लिए जरूरी जानकारी आपको मुहैया कराता रहूंगा|

धन्यवाद

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