Negotiable instrument act in Hindi | परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881

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Negotiable instrument act: इस पोस्ट का टॉपिक है “negotiable instrument act 1881” 

इस अधिनियम को  अच्छी तरह समझने के लिए सबसे पहले हमें नेगोशिएबल का मतलब समझना पड़ेगा|

हां हां भाई! मैं समझ गया जो आप सोच रहे हैं, इसका मतलब वह नहीं होता| यदि आप नेगोशिएबल का अर्थ सौदेबाजी/बारगेनिंग समझ रहे थे तो यह बिल्कुल गलत है| 

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट का अर्थ क्या होता है? (Negotiable meaning in Hindi)

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट में नेगोशिएबल का अर्थ होता है|

Negotiable meaning in Hindi: “हस्तांतरणीय (transferable)”

Negotiable instruments act में Instruments का अर्थ: “कोई ऐसा पेपर या ऑब्जेक्ट जिसकी आधार पर ट्रांसफरेबिलिटी की जा सकती है|” 

Negotiable instruments meaning in Hindi (परिभाषा): “वह दस्तावेज जो आसानी से ट्रांसफर किए जा सकते हैं या ट्रांसफर होने योग्य है और यह पैसे को अधिग्रहण करने का अधिकार देते हैं|” 

उदाहरण:  इस एक छोटे से उदाहरण से आपको यह सारा कांसेप्ट अच्छी तरह क्लियर हो जाएगा| 

जैसे कि आप चैक (Cheque) के बारे में तो जानते ही होगे|  यदि आपको किसी ने चैक (Cheque)  दिया| इस पर देने वाले वाले ने नाम का कॉलम छोड़कर बाकी सब चीज भर दी|  

अब!  आपको किसी को पेमेंट देनी थी|  आपको जिसे पेमेंट देनी थी उसे आपने उस पेमेंट के बदले में इस चेक को दे दिया| इसे ही ट्रांसफरेबल इंस्ट्रूमेंट कहते हैं| इस चेक की अंतिम तिथि आने तक, इस चेक को कितनी भी बार ट्रांसफर किया जा सकता है| इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए ही negotiable instrument act बनाया गया था| 

सवाल: अब दिमाग में से एक सवाल ही है आता है कि “क्या करेंसी नोट भी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट के अंतर्गत माना जाएगा?”

जवाब: जी नहीं,  करेंसी नोट नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट के अंतर्गत नहीं माना जाएगा| 

इसके साथ ही आपने “मनी मार्केट क्या होती है?” ट्रेजरी  बिल के बारे में भी पढ़ा था| ट्रेजरी बिल भी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट नहीं माने जाएंगे| पोस्ट आर्डर के मनी ऑर्डर भी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट नहीं माने जाएंगे| 

आपने कहीं ना कहीं हुंडी का नाम अवश्य सुना होगा!

हुंडी क्या होती है?: हुंडी भी एक नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट होती है| यह बिल ऑफ एक्सचेंज या प्रॉमिससरी नोट की फॉर्म में हो सकता है| 

स्थानीय भाषा में लिखा जाता है इसलिए इसे हुंडी कहते हैं| हुंडी एक बहुत पुराना उपकरण है| इसके सभी प्रावधानों को स्थानीय रीति-रिवाज़ द्वारा नियंत्रित किया जाता है| 

यदि लेनदेन करने वाले दोनों पार्टियां यह स्वीकार करने की इस हुंडी को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट की तरह व्यवहार में लाया जाएगा, तो उस हुंडी पर भी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट लागू होगा|

यदि हुंडी में किसी विषय के बारे में खुलकर नहीं लिखा गया है तो negotiable instrument act की मदद से उसे सुलझाया जाएगा| 

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट कितने प्रकार के होते हैं? | परक्राम्य लिखत कितने प्रकार के होते हैं?

Negotiable instruments तीन प्रकार के होते हैं|

  1. प्रॉमिससरी नोट / Pro-Note (सेक्शन 4 में आता है)
  2. बिल ऑफ एक्सचेंज / Bill (सेक्शन 5 में आता है)
  3. चैक (Cheque) (सेक्शन 6 में आता है)

आप सब लोगों ने बिल ऑफ एक्सचेंज के बारे में जानते ही हैं| प्रॉमिससरी नोट बी कुछ-कुछ बिल ऑफ एक्सचेंज की तरह ही होता है| चैक (Cheque) के बारे में तो आप सब लोग निश्चित तौर पर जानते ही होंगे| 

इनमे से तीनों नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट को पेमेंट के लिए प्रजेंट करना पड़ता है, परंतु एक्सेप्टेंस के लिए इन तीनों को प्रजेंट नहीं किया जाता| 

केवल बिल ऑफ एक्सचेंज ऐसा डॉक्यूमेंट है जिसे  पेमेंट के लिए तो प्रजेंट करना ही पड़ता है साथ ही एक्सेप्ट भी कराना पड़ता है|

यानी कि केवल बिल ऑफ एक्सचेंज ही एक ऐसा नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट है जिसे एक्सेप्ट कर आना पड़ता है| 

यदि इन तीनों नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट को पेमेंट के लिए प्रजेंट करने पर पेमेंट नहीं मिलती तो उसे Dishonour कहा जाता है| 

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट को बनाने का मकसद क्या था?

Negotiable instrument act 01/03/1882 को प्रभाव में आया था| इस अधिनियम को बनाने का मकसद व्यापार तथा वाणिज्य को बढ़ाना था| हर एक्ट की तरह negotiable instrument act की परिभाषा सेक्शन 2 में नहीं है| इसकी परिभाषा सेक्शन 13 में दी गई है| 

Negotiable instruments act का इतिहास 

Negotiable instruments act 1/March/1882 को प्रभाव में आया था| English common law द्वारा नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट बना था|

व्यापार (Trade) तथा वाणिज्य (Commerce) को सुगम बनाने के लिए यह एक्ट बनाया गया था| इसे कितनी भी बार नेगोशिएट किया जा सकता है|

यानी कि यदि किसी नेगोशिएट इंस्ट्रूमेंट की मैच्योरिटी 3 महीने की है तो उसे इस 3 महीने के दौरान कितनी बार भी ट्रांसफर किया जा सकता है| 

Section 138 of negotiable instrument act

यह “Section 138 of negotiable instrument act” का मुख्य सेक्शन है इसलिए मैं इसके बारे में थोड़ा सा लिख रहा हूं|

यह चेक के dishonour (अस्वीकृत) होने के विषय में बताता है|  किसी के खाते में यदि जितनी भी धनराशि है और वह उससे ऊपर की रकम का चेक बना कर किसी को दे देता है तो निश्चित तौर पर ही वह dishonour (अस्वीकृत) हो जाएगा|  सामान्य भाषा में हम इसे कहते हैं कि “चेक बाउंस हो गया|” 

इस स्थिति में चेक देने वाले पर केस भी किया जा सकता है|  उसे 2 साल की सजा या चेक की राशि की दोगुनी रकम देनी पड़ सकती है|  यह दोनों सजाएं साथ भी चल सकती हैं|

इसके लिए भी तीन परिस्थितियां होने अनिवार्य है|

  1. चेक की लास्ट डेट से पहले वह बैंक में जमा करा दिया गया हो| 
  2. चेक बाउंस की रिपोर्ट मिलने के बाद, 30 दिन के अंदर चेक देने वाले को नोटिस देना जरुरी है| 
  3. इस नोटिस को मिलने के 15 दिन बाद, यदि उसके बकाया का भुगतान नहीं हो पाता तो पीड़ित Section 138 of negotiable instrument act के तहत कार्रवाई कर सकता है| 

Section 143a of negotiable instrument act

इस सेक्शन के अंतर्गत जब भी अदाकर्ता (drawee-हुंडी की रकम लेने वाला), Drawer (चैक काटने वाला, आदेशक) के विरुद्ध सेक्शन 138 में मुकदमा दायर करेगा तो न्यायालय द्वारा 

चेक का Drawer (चैक काटने वाला, आदेशक) बरी कर दिया जाता है, तो न्यायालय शिकायतकर्ता को संबंधित वित्तीय वर्ष की शुरुआत में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित बैंक दर पर ब्याज के साथ, अंतरिम मुआवजे की राशि का भुगतान करने का निर्देश दे सकता है , इस आदेश की तारीख से साठ दिनों के अंदर, या ऐसी और अवधि होनी चाहिए जो कि शिकायतकर्ता द्वारा पर्याप्त कारण बताए जाने पर न्यायालय द्वारा निर्देशित तीस दिनों से अधिक न हो।

साथ ही यह भी अवश्य देखें:

फैक्ट्री act 1948 क्या है?

चाइल्ड लेबर कानून 1986 क्या है?

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम: 1948 क्या है?

मजदूरी भुगतान अधिनियम: 1936 क्या है?

समाप्त

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