न्यूनतम मजदूरी अधिनियम क्या है? | Minimum wages act 1948 in Hindi

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दोस्तों, अब आप सोच रहे होगे कि मैं बिजनेस के बारे में बताता हूं तो इसमें “minimum wages act 1948” कहाँ से आ गया?!! 

तो भाई लोगों! यदि बिजनेस में कोई कानून बना है तो आपको उसके बारे में पता होना चाहिए|

मैं आप लोगों को एक ऐसा प्लेटफार्म देना चाहता हूं जिसमें कि आप बिजनेस से संबंधित सभी विषयों के बारे में जानकारी ले सकें और अपनी इसी महत्वाकांक्षा के चलते मैंने बिज़नेस लोक का निर्माण किया है|

अब यदि बिजनेस की बात होती है और बिज़नेस के कानूनों के बारे में ना लिखूँ तो ब्लॉग अधूरा रह जाएगा| 

क्योंकि यदि आप बिजनेस करते हैं तो आपके पास में एंपलॉयर भी अवश्य ही होंगे| 

इन्हीं एंपलॉयर के हितों के लिए लेबर लॉ बनाए गए हैं|

जैसे:- मातृत्व अधिनियम है वैसे ही लेबर लॉ का एक अधिनियम है- मिनिमम वेजेस एक्ट 1948 

इसलिए कृपया आप यह पोस्ट मिनिमम वेजेस एक्ट 1948 को पूरा पढ़ें| हो सकता है इस पोस्ट में आपके काम की भी काफी बातें मिल जाए!!

चलिए दोस्तों!  शुरू करते हैं हमारा आज का यह टॉपिक  “minimum wages act 1948” 

What is the minimum wages act 1948?

आइए! सबसे पहले शुरुआत करते हैं कि आखिर न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 क्या है?

न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 (minimum Wages act 1948) 15 मार्च 1948 को पास हुआ था|

Minimum wages act 1948 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी तय की जाती है|  

इसको अच्छी तरह समझाने के लिए मैं एक छोटा सा शेर भी कहना चाहूंगा|

“वो ही दाना देगा जिसने चोंच दी है,

इसी अवफ़ाह ने इस चिड़िया की जान ली है

इबादत ना अब! हो पाएगी अब हमसे

भूखी अंतड़ियों ने अब ये ज़िद ठान ली है|”

यानी की भूख ऐसी चीज है जो गरीब का पीछा ही नहीं छोड़ती| 

जैसे रावण को हर साल मारते हैं पर वह हर साल फिर दोबारा जिंदा हो जाता है ठीक उसी प्रकार रात को पेट भरने के बाद भी फिर वही भूख सुबह खड़ी होती है और इसी भूख का फायदा कुछ मगरमच्छ उठाने की कोशिश में लगे रहते हैं| 

वह हमेशा  गिद्ध की तरह सोचते रहते हैं कि “कब कोई मरेगा और उसे कब खाना मिलेगा”

इसी भूख के चलते कोई भी गरीब जरूरतमंद मजदूर बहुत ही कम वेतन पर भी काम करने को तैयार हो जाता है| इसी मजबूरी का फायदा कोई मगरमच्छ ना उठा ले इसलिए लेबर लॉ में मिनिमम वेजेस एक्ट बनाया गया है|

नोट:– मजबूरी का फायदा उठाने से मेरा तात्पर्य यह है की “ यदि किसी काम को करने के लिए जितना मेहनताना मिलना चाहिए उससे भी बहुत कम मेहनताना दिया जा रहा हो|” 

पहले भी एक कानून था – “Payment of wages act 1936– इसके अंतर्गत पेमेंट कब मिलनी चाहिए यह बताया गया था|

पर कितना मिनिमम  वेतन मिलना चाहिए? यह नहीं बताया था|  

इसलिए जब सरकार ने देखा कि कुछ उद्योगपतियों तथा जमींदारों द्वारा मजदूरों का शोषण किया जा रहा है तब सरकार मिनिमम वेजेस एक्ट 1948 लेकर आई|

इस अधिनियम के तहत या तो केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा सबसे पहले सरकार द्वारा सभी प्रकार के एंपलॉयर की सूची तैयार की गई|  

इस सूची को Scheduled employment कहा गया| शेड्यूल्ड एंप्लॉयमेंट को भी दो पार्ट- “पार्ट 1 तथा पार्ट 2” में बांटा गया 

नोट:- इस सूची के अंदर आने वाले रोजगार प्रक्रिया (employment process) तथा शाखाएं (Branches) भी इसके अंदर सम्मिलित की गई है|

जैसे:- किसी फैक्ट्री का सारा काम एक ही जगह ना होकर अलग-अलग होता हो| उदाहरण:-  किसी फैक्ट्री का कोई सामान पैकिंग के लिए बाहर जाता हो| 

Part 1 – इसमें टोटल 21 एंप्लॉयमेंट थे|

Part 2 -इसमें केवल 1 एंप्लॉयमेंट को रखा गया और वह एंप्लॉयमेंट थी एग्रीकल्चर| ऐसा करने का मुख्य कारण यह है क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले कामगार भी इसी कैटेगरी के थे| 

इसी सूचियों के हिसाब से यह देखा गया कि कौन सी एंप्लॉयमेंट किस पार्ट में आएगी? तथा फिर यह निश्चित किया गया कि किस पार्ट में कितनी मिनिमम वेजेस मिलनी चाहिए?  यानी वेतन मिलना चाहिए| 

Employer तथा Employee कौन होते हैं?  

अब तक तो हम बात कर रहे थे मिनिमम वेजेस एक्ट 1948 के बारे में| 

अब आप यह भी जान चुके हो कि इस कानून के अंतर्गत कुछ मिनिमम वेतन तय किया गया था जो कि कामगार को मिलना ही चाहिए| 

परंतु हमें यह भी तो पता होना चाहिए कि हम किसे एंप्लॉयर कहेंगे तथा किसे एंप्लोई कहेंगे?, वेजेस किसे कहते हैं

एंप्लॉयर की परिभाषा (Employer definition)

आपको Employer की परिभाषा इसलिए जानना जरूरी है क्योंकि कानून का उल्लंघन होने की स्थिति में एंपलॉयर तो यह कह देगा कि “मैं एंपलॉयर हूं ही नहीं” – ऐसी स्थिति में दंड किस पर लगाया जाएगा?

तो चलिए! पहले जान लेते हैं कि एंप्लॉयर कौन होगा? 

एंप्लॉयर की परिभाषा: “एंपलॉयर वह व्यक्ति होता है जो किसी अन्य व्यक्ति को नौकरी देता है| इसमें नौकरी देना परोक्ष (Directly) अथवा अपरोक्ष (Indirectly) दोनों प्रकार से शामिल है| किसी और के द्वारा भी नौकरी देना इसी में शामिल है| या तो व्यक्ति खुद नौकरी दे रहा है  या फिर वह किसी को इस कार्य को करने के लिए अधिकृत कर रहा है|”

चलिए! लास्ट वाली लाइन को थोड़ा सा आसान बना देता हूं| 

मान लीजिए! आपकी एक कंपनी है| आपने अपने नीचे एक मुनीम रखा और उसको कहा कि वह अपने नीचे किसी को एंप्लॉई रख ले| अब यह मुनीम एंप्लॉयर कहलाएगा| 

थोड़ा सा यह भी जान लेते हैं कि किस संस्थान में एंपलॉयर किसे मानेंगे?

कारखाना (Factory) 

वह फैक्ट्री जो शेड्यूल्ड एंप्लॉयमेंट में पार्ट वन की कैटेगरी में आती है| जिसमें minimum wages act 1948 के तहत वेजेस फिक्स किए गए हैं| 

इसमें मैनेजर को एंपलॉयर माना जाएगा चाहे वह फैक्ट्री का मालिक हो चाहे वह फैक्ट्री के मालिक ना हो| 

Manager: फैक्ट्री अधिनियम 1948 के अंदर वर्णित किया गया है|

सरकारी संस्थान (Government Entity)

केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाले सरकारी संस्थान में या तो सरकार द्वारा तय किया जाता है कि किस व्यक्ति को एंपलॉयर माना जाए| 

अन्यथा विभाग के मुखिया को एंपलॉयर माना जाएगा| 

एक उदाहरण द्वारा में इस बिंदु को और अधिक स्पष्ट कर देता हूं|

 जैसे कि जल बोर्ड में विभाग का मुखिया चेयरमैन पर्सन होता है और चेयरमैन का पद दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री का होता है| 

अब इस स्थिति में दिल्ली सरकार का मुख्यमंत्री जल बोर्ड का मुखिया माना जाएगा| 

इस स्थिति में जल बोर्ड का एंपलॉयर दिल्ली सरकार का मुख्यमंत्री होगा|

लोकल अथॉरिटी के केस में: जैसे कि MCD, PWD- इसमें भी या तो एंप्लॉयर के पद पर किसी के नियुक्ति होगी और यदि ऐसा नहीं किया गया है तब इस संस्थान में CEO (Chief executive officer) को employer माना जाएगा| 

कोई अन्य मामला 

मान लीजिए ऊपर दिए गए तीनों संस्थानों के अलावा कोई ऐसा संस्थान है| 

जैसे कि:- वन पर्सन कंपनीप्रोपराइटरशिप फर्मप्राइवेट लिमिटेड कंपनीपब्लिक लिमिटेड कंपनीसेक्शन 8 कंपनी इत्यादि 

मालिक के द्वारा इन संस्थानों में वह व्यक्ति जिसे कर्मचारी को मजदूरी के भुगतान की देखरेख और नियंत्रण करने की शक्ति दी गई है वह एंपलॉयर कहलाया जाएगा|

एम्प्लोयी की परिभाषा (Employee definition)

एम्प्लोयी की परिभाषा: “एक व्यक्ति जो भुगतान के बदले में किसी अन्य या किसी व्यवसाय, फर्म आदि के लिए काम पर रखा जाता है| यह काम लेखन संबंधी (clerical), तकनीकी (technical), मशीनी (mechanical) हो सकता है| इसमें कुशल (Skilled), अकुशल (Unskilled) कैसा भी काम हो सकता है| मेहनताने का भुगतान employment के terms के आधार पर होगा| यह टर्म्स व्यक्त (Express)  भी हो सकती हैं और लक्षित (implied) भी हो सकती हैं|”

लक्षित का अर्थ: “जिसके बारे में देख सुनकर पता चल जाए कि इसके क्या टर्म्स हैं| जैसे कि दिहाड़ी मजदूर को पता होता है कि इस वक्त ₹500 की दिहाड़ी चल रही है और इसमें कितनी देर का लंच होगा और क्या-क्या काम करना है? इत्यादि|”  

  • इसमें बाहर काम करने वाला (Out worker)  भी सम्मिलित माना जाएगा| 

इसमें धुलाई (Washing), सफाई (Cleaning), परिवर्तन (altering), मरम्मत (Repairing), परिष्करण (Finishing), आभूषण (Ornamenting), बिक्री के लिए अनुकूल या संसाधित किया गया (adapting, or processed for sale)

आउट वर्कर का अर्थ: “जिन लोगों को किसी फैक्ट्री मालिक द्वारा कच्चा पदार्थ दे दिया जाता है तथा वह उसे अपने घर से या अन्य किसी स्थान से तैयार कर के लाते हैं|” 

उपयुक्त सरकार द्वारा प्रदान की सूची जिसमें जिन एंप्लॉयर को वर्णित किया गया है लेकिन इसमें हथियारबंद सेनाओं को शामिल नहीं किया गया है| 

Minimum wages act 1948 के अनुसार वेतन क्या है?

न्यूनतम वेजेस जानने से पहले हमें Wages क्या है? यह भी जान लेना चाहिए| 

वेतन की परिभाषा: “मजदूरी पारिश्रमिक है (Wages is the remuneration)| पैसे के मामले में व्यक्त किए जाने में सक्षम हो (capable of being expressed in terms of money) जो रोजगार की शर्तों को पूरा करने के बाद देना होता है- चाहे व्यक्त या निहित हो (Which is payable after the fulfillment of terms of employment – whether expressed or implied)”

वेतन में क्या शामिल (Include) होगा और क्या शामिल नहीं होगा?

वेतन में क्या शामिल होता है? (Include): “इसमें मकान किराया भत्ता शामिल होता है (It includes house rent allowance)”

वेतन में क्या शामिल नहीं होता? (Not Include) “इसमें आवास (Accommodation), बिजली (Light), पानी की आपूर्ति (Water supply), चिकित्सा बिल (Medical bill), भविष्य निधि योगदान (provident fund contribution), यात्रा भत्ता (Traveling allowance), ऐच्छिक दान (Any gratuity), नौकरी की प्रकृति के कारण विशेष खर्चों को बाधित करने के लिए कोई भी राशि (any amount to defray special expenses due to the nature of the job), उपयुक्त सरकार द्वारा निर्दिष्ट कोई भी राशि (any amount specified by the appropriate government), पेंशन योजना का योगदान (Pension scheme contributions) शामिल नहीं होती|”

मिनिमम वेजेस आप सरकार की इन Websites के द्वारा देख सकते हैं:-

1- Chief labor Commissioner (Central)

2- Paycheck

मिनिमम वेजेस अधिनियम 1948 का उल्लंघन करने पर क्या जुर्माना लग सकता है?

जैसे कि:- दिल्ली सरकार द्वारा राष्ट्रपति की मंजूरी लेकर 2017 के मिनिमम वेजेस अधिनियम संशोधन में कर्मचारियों को एक बड़ा तोहफा दिया है| 

कृपया काम देनेवाले (Employers)ध्यान दें: न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत जुर्माना न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने में विफल पाए जाने पर  जुर्माना 500 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दिया गया है तथा कारावास की अवधि को भी छह महीने से बढ़ाकर तीन साल कर दिया गया है। इसमें अन्य अपराधों के लिए जुर्माना भी 500 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये कर दिया गया है।

अब आप समझ गए होंगे कि यदि आप बिजनेस करते हैं और आपके पास कर्मचारी काम करते हैं तो उनको कुछ न्यूनतम मजदूरी पाने का हक होता है|

ऐसा न करने की स्थिति में आप पर जुर्माना भी लग सकता है तथा सजा भी हो सकती है|

मेरी राय 

इस पोस्ट के द्वारा में किसी पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा हूं| लेबर लॉ से जुड़े सारे मामलों को भावनात्मक तरीके से देखना चाहिए| कभी भी किसी की मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहिए| परिस्थितियों में कभी भी हेर-फेर हो सकता है| इंसान को इंसान के साथ, हमेशा इंसान की तरह ही व्यवहार करना चाहिए| 

यदि आप कहीं पर नौकरी करते तो आप अपने मालिक से क्या उम्मीद करते? इस बारे में भी आपको सोचना चाहिए| 

पोस्ट के द्वारा किसी का दिल दुखाना मेरा कतई मकसद नहीं है| यदि किसी को फिर भी बुरा लगा हो तो मैं हाथ जोड़कर क्षमा का प्रार्थी हूं| यदि भाषा की कोई त्रुटि रह गई हो तो कृपया उसके लिए भी क्षमा करें| 

साथ ही यह भी अवश्य देखें:

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उम्मीद करता हूं की आप minimum wages act 1948 (न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948) के बारे में अच्छी तरह समझ गए होंगे|

 इसी तरह की नई पोस्ट में फिर मिलेंगे| मैं नवीन कुमार आपसे इजाजत चाहूंगा| 

 धन्यवाद

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