IPO क्या होता है? | बिज़नेस करते हैं तो आईपीओ के बारें में जानकारी अवश्य लें!

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दोस्तों, यदि आप बिजनेस करते हैं तो आपको IPO के बारे में अवश्य ही पता होना चाहिए|

आप शेयर मार्केट के बारे में जानना चाहते हैं तब भी आपको आईपीओ के बारे में अवश्य पता होना चाहिए| 

इस पोस्ट What is IPO in Hindi: के द्वारा मैं आपको आईपीओ के बारे में सारी जानकारी दूंगा|

 तो चलिए दोस्तों शुरू करते हैं! 

आईपीओ क्या होता है?: What is IPO in Hindi

(What is IPO in Hindi) आईपीओ क्या होता है?:- जानने से पहले आपको एक चीज पता होनी चाहिए कि आईपीओ तथा पब्लिक इश्यू एक ही चीज़ होती है|

आपको आईपीओ की फुल फॉर्म भी पता होनी चाहिए| 

IPO Full form: “initial public offering”

IPO Hindi meaning: “सार्वजनिक प्रस्ताव”

आई पी ओ का अर्थ होता है- “जब कोई कंपनी पहली बार आम जनता के सामने प्रस्ताव रखती है कि आप आइए और हमारे शेयर में पैसा लगाइए|” 

कंपनी जब यह ऑफर देती है तो उससे पहले भी तो कंपनी चल रही होती है! किसी ने तो पैसा लगाया होगा?  

वह सामान्यतः कंपनी के प्रमोटर होते हैं जिन्होंने शुरुआत में कंपनी में पैसा लगाया होता है या उनके दोस्त अथवा रिश्तेदार होते हैं| 

यानी कि काफी कम लोग होते हैं जिन्होंने शुरुआत में पैसा लगाया होता है|

कुछ प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टर्स भी हो सकते हैं| लेकिन इनकी संख्या काफी कम होती है| 

जब कंपनी के प्रमोटर्स को लगता है कि –

”उन्हें बिजनेस बढ़ाना है” या  “उन्हें अपनी कंपनी को शेयर बाजार मैं ट्रेड करवाना है” या  “कंपनी को लिस्ट करवाना है: 

तब वह Public Issue लाने की कोशिश करते हैं| 

यह ईशु किसी भी निवेशक को कंपनी में पैसा लगाने के लिए आमंत्रित कर सकता है| चाहे वह आप हो चाहे मैं| 

इसी कारण से इन्हें पब्लिक इश्यू कहा जाता है क्योंकि इसमें आम पब्लिक को पैसा लगाने के लिए आमंत्रित किया जाता है| 

अर्थात जब कोई कंपनी पहली बार आम जनता के सामने अपनी कंपनी में शेयर के द्वारा पैसा लगाने को आमंत्रित करती है उसे इनिशियल पब्लिक ऑफ्रिंग (IPO) कहते हैं| 

इसमें कंपनी आम जनता को एक ऑफर देती है कि आप आइए और इस दाम पर हमारा शेयर खरीदिए| 

IPO की साधारण भाषा में परिभाषा

“आईपीओ में पैसा लगाने से आप कंपनी के शेयर धारक बन जाते हैं या कंपनी में निवेश करते हैं|” 

आप ऐसा भी  समझ सकते हैं कि आईपीओ में पैसा लगाने से आप उस कंपनी में पार्टनर बन जाते हैं क्योंकि कोई भी बिजनेस पूंजी (Capital) के द्वारा ही चलता है तथा जब आप किसी कंपनी के शेयर खरीदते हैं तब आप उस कंपनी का एक हिस्सा बन जाते हैं या फिर यूं भी कह सकते हैं कि आप उस कंपनी में शेयर होल्डर बन जाते हैं| 

क्या कंपनी IPO में नए शेयर बेचती है?

सामान्यत है आईपीओ में कंपनी नए शेयर ही बेचती है परंतु केवल कुछ मामलों मैं ऐसा होता है कि इसमें नए शेयर ना बेच कर पुराने इन्वेस्टर्स के शेयर बेचे जाते हैं|

पुराने शेयर इन्वेस्टर्स के होते हैं और पुराने शेयर या तो प्रमोटर्स के पास होते हैं या फिर वह फंड होता है|

अब आप सोच रहे होंगे कि वह इन शेयर्स को क्यों बेचते हैं? तो इसका जवाब है- मान लीजिए उन्होंने जब कंपनी स्टार्ट की 3 साल या 5 साल पहले|

उस वक्त कंपनी बहुत छोटी थी| अब कंपनी का साइज बहुत बड़ा हो गया| कंपनी के शेयर लिस्ट भी करवाए जा रहे हैं|

 ऐसी स्थिति में प्रमोटर सोचते हैं कि उन्हें भी थोड़ा सा प्रॉफिट लेना चाहिए|

यह ठीक बात है कि प्रॉफिट तो लेना ही चाहिए| इस स्थिति में वह अपने शेयर्स को भी ऑफर कर देते हैं| इन शेयर्स की संख्या कुछ भी हो सकती है| 

इसे ऑफर फॉर सेल भी कहा जाता है|

यानी कि एक्जिस्टिंग शेयर होल्डर या प्रमोटर के द्वारा अपने शेयर को ऑफर करना ऑफर फॉर सेल कहलाता है| 

परंतु इसका मतलब यह बिल्कुल मत निकाल लेना कि प्रमोटर जो शेयर बेच रहे हैं वह खराब हैं| 

FPO क्या होता है?

उम्मीद करता हूं आप IPO  के बारे में अच्छी तरह समझ गए होंगे| 

अब आपको एसपीओ के बारे में समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी|

FPO full form – “Follow on Public Offer”

FPO Definition in Hindi (एफपीओ की परिभाषा)- “IPO के बाद कंपनी फिर से बार आम जनता के सामने शेयर को बेचने के ऑफर को लाती है उसे FPO  कहते हैं|”

यानी कि जनता के सामने पहली बार जो कंपनी ने ऑफर रखा उसे IPO तथा उसके बाद जो ऑफर देगी उन्हें FPO कहा जाएगा| 

किसी कंपनी का जब भी कोई FPO आता है उसके शेयर पहले से लिस्टेड होते हैं|

उन शेयर की ट्रेडिंग हो रही होती है परंतु जब IPO आता है तो कंपनी डिसाइड करती है कि उन्हें किस प्राइस पर शेयर ऑफर करने हैं| 

 वैसे तो FPO  में भी शेयर का प्राइस कंपनी ही डिसाइड करती है परंतु मार्केट को पता होता है कि उस शेयर का भाव क्या है क्योंकि वह पहले से ही उनकी खरीदारी तथा बिकवाली कर रहे होते हैं| 

FPO का बिल्कुल सामान्य भाषा में अर्थ – Follow on Public Offer (FPO) लिस्टिंग के बाद आता है तथा IPO  लिस्टिंग से पहले आता है|”

कंपनियां आईपीओ क्यों लेकर आती है? 

पब्लिक लिमिटेड कंपनी को जब भी धन की आवश्यकता होती है तो वह आईपीओ लेकर आती हैं| 

अब!  पैसा क्यों चाहिए इसकी अलग अलका वजह हो सकती है|  

जैसे कि- (1)- कंपनी के शुरुआती प्रमोटर्स जिन्होंने जब कंपनी में पैसा लगाया तब कंपनी बहुत छोटी थी क्योंकि अब अब कंपनी बड़ी हो चुकी है और साथ-साथ लिस्ट भी हो चुकी है तो वह अपना लगाया हुआ पैसा वापस पाना चाहते हैं| 

 (2)- कंपनी के ऊपर पुराना कोई कर्ज है तो उसको चुकाने के लिए भी कंपनियां आईपीओ लेकर आती है| 

आईपीओ के द्वारा मिले हुए पैसे से कंपनी अपना कर्ज उतार देती है और कंपनी को बिना ब्याज के धन मिल जाता है|

 (3)- कंपनी को अपना काम काज करने के लिए धन की आवश्यकता है इसलिए कंपनियां IPO लेकर आती है| 

 (4)- इसके द्वारा कंपनी नया कारोबार भी कर सकती है| 

जैसे कि कंपनी के पास एक प्लांट है तथा वह एक और प्लांट लगाकर व्यापार को बढ़ाना चाहती है| 

नोट:- कंपनी को जिस चीज के लिए पैसा चाहिए वह कंपनी को बताना पड़ेगा| 

शेयर लेने पर कंपनी में किसकी कितनी हिस्सेदारी होगी?/ मिनिमम कितने शेयर ले सकते हैं? 

इसमें दो चीजें होती है|

पहली-  मिनिमम तो आप एक शेयर भी ले सकते हैं| लेकिन जब आप पब्लिक इश्यू में अप्लाई करते हैं तो उसमें लॉट होते हैं| 

इस लॉट में शेयरों की कुछ संख्या निर्धारित होती है| आप को कम से कम उतने शेयर तो आईपीओ में लेने ही पड़ेंगे| 

यह लॉट साइज अलग-अलग कंपनियों के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है| 

यह उनकी कीमत पर पर भी निर्भर करता है| इसका निर्णय सेबी द्वारा लिया जाता है| 

जिस दिन शेयर लिस्ट हो जाता है उसके बाद आप एक शेयर भी खरीद सकते हैं| 

लिस्टिंग के बाद कितने शेयर किसके पास हैं, इसका लेखा-जोखा शेयर होल्डिंग के पैटर्न से पता चल जाता है| 

शेयर होल्डिंग का पैटर्न क्या होता है?

SEBI के नियम के मुताबिक किसी भी कंपनी के न्यूनतम 25% शेयर आम निवेशकों के पास होना जरूरी होता है| 

25% का नियम सेबी द्वारा इस लिए बनाया गया है ताकि लिक्विडिटी (नकदी) सुनिश्चित हो सके| 

किसी भी कंपनी को जब भी कोई आईपीओ लाना होता है तब कंपनी के पास जितनी भी पूंजी होती है, शेयर लिस्टिंग के बाद उसका 25% आम निवेशकों के पास होना चाहिए| 

यानि IPO के पहले के शेयर की पूंजी को छोड़कर उसके बाद की पूंजी में 25 पर्सेंट के शेयर आम निवेशकों के पास होने चाहिए|

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कोई भी प्रमोटर यह कहने लगे कि “मैं तो एक पर्सेंट लिक्विडिटी का ही ISSUE लेकर आऊंगा| 99% मैं अपने पास रखूंगा|” 

ऐसी स्थिति में होगा यह है कि वह शेयर का दाम कुछ भी रख सकता है! कितना भी बढ़ा सकता है! 

साथ ही साथ पब्लिक को खरीदने बेचने में भी परेशानी होगी|  

ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही सेबी ने यह नियम बनाया है| 

नोट:- यह नियम केवल प्राइवेट कंपनियों के लिए ही नहीं सरकारी कंपनियों के लिए भी होता है| 

IPO Process

आईपीओ प्रोसेस को जानने से पहले आपको एक चीज अच्छी तरह जान लेनी चाहिए की सब कंपनियों की तरह चाहे वह

(वन पर्सन कंपनी हो, स्मॉल कंपनी हो, सेक्शन 8 कंपनी हो, प्राइवेट लिमिटेड कंपनी हो, पब्लिक लिमिटेड कंपनी हो) सभी में Perpetual succession का नियम लागू होता है|

Perpetual succession की वजह से लोगों का विश्वास किसी भी कंपनी पर काफी बढ़ जाता है| 

RHP तथा DRHP क्या होता है?/ RHP VS DRHP

जैसा की आप जानते हैं कंपनी के सबसे 3 जरूरी डाक्यूमेंट्स होते हैं|

1-  मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन

2-  आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन

3-  प्रस्पेक्टस 

सबसे पहले हम RHP तथा DRHP की फुल फॉर्म जान लेते हैं| 

RHP full form – “Red Herring Prospectus”

DRHP full form – “Draft red herring prospectus”

IPO (initial public offering) लाने का एक प्रोसेस होता है|

ऐसा नहीं है कि मेरी कोई कंपनी है और अचानक से मेरे दिमाग में ख्याल आया कि चलो! आईपीओ ले आते हैं!! और मैं लोगों से कहूं कि “भाई कल से मेरे शेयर ट्रेड करने लगेंगे जिसको पैसा लगाना है लगा लो!!”

ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि हमें इसके लिए पहले सेबी से अप्रूवल लेना पड़ेगा| 

सेबी स्टॉक मार्केट में सबकी रेगुलेटर होती है| 

आइए! इसका थोड़ा सा प्रोसेस जान लेते हैं| इसी प्रोसेस में आपको आपके सवाल “RHP तथा DRHP क्या होता है? का जवाब मिल जाएगा|”

  • सबसे पहले एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी होने चाहिए जिसको IPO लाना है|
  • वह कंपनी एक मर्चेंट बैंकर के पास जाएगी| मर्चेंट बैंकर कुछ ब्रोकर्स तथा बैंकर्स का समूह होता है| यह मर्चेंट बैंकर पब्लिक इश्यू लाने का काम करते हैं| यह ठीक उसी प्रकार काम करते हैं जैसे एक्सपोर्ट इंपोर्ट बिजनेस में कस्टम हाउस एजेंट काम करता है| 
  • अब कंपनी इन मर्चेंट बैंकर्स के पास  जाएगी और बोलेगी कि “ हमें पब्लिक इश्यू लाना है, हमें तैयारी करवाइए” 
  • मर्चेंट बैंकर कंपनी के तमाम तरह के डाक्यूमेंट्स, प्रमोटर्स तथा स्टेटमेंट्स इत्यादि की  पूरी जानकारी इकट्ठी करते हैं| यह जानकारी उन्हें रेड हियररिंग प्रोस्पेक्टस द्वारा मिल जाती है| 
  • RHP (Red Herring Prospectus) के बारे में यदि मैं समझाऊं तो ऐसा कह सकता हूं कि RHP (Red Herring Prospectus) कंपनी की जन्मकुंडली होती है| उदाहरण के लिए बताऊं तो  इसमें प्रमोटर्स के बारे में क्या-क्या जानकारी हो सकती है- प्रमोटर्स ने कहां पढ़ाई की है?,  उनके पास क्या डिग्री है?, अनुभव कितना है?,  किस किस कंपनी में प्रमोटर रह चुके हैं?, कौन कौन से बिजनेस कर चुके हैं?,  कौन-कौन से क्रिमिनल एक्शन उनके अगेंस्ट में चल रहे हैं?, पहले कहीं किसी कंपनी में उन्होंने फ्रॉड तो नहीं किया?, इस तरह की सारी इनफार्मेशन आपको आरएचपी (Red Herring Prospectus) में मिल जाएगी| 
  • पहले सारी डिटेल्स  को मर्चेंट चेक बैंक पर चेक  करते हैं| सारे डाक्यूमेंट्स को  ध्यान पूर्वक चेक करने के बाद यह सारी जानकारी मर्चेंट बैंकर सेबी तक पहुंचाते हैं| 
  • सेबी अपने हिसाब से इन डाक्यूमेंट्स की  चेकिंग करती है| यदि उसे लगता है कि और भी डाक्यूमेंट्स उसे चाहिए तो वह उनकी डिमांड करती है|
  • जब तक की है डाक्यूमेंट्स चेकिंग की प्रक्रिया चलती रहती है तब तक उसे DHRP (Draft red herring prospectus) कहते हैं| 
  • ड्राफ्ट का मतलब ही फाइनल ना होने से होता है| मैंने इसके बारे में आपको एक्सपोर्ट इंपोर्ट बिजनेस के  पोस्ट में बताया था|  इसमें मैंने लेटर ऑफ क्रेडिट के बारे में बताया था कि आप LC को फाइनल करने से पहले उसके ड्राफ्ट पर काम करें| यानी साधारण शब्दों में कहूं तो किसी भी डॉक्यूमेंट के फाइनल होने से पहले का वर्जन ड्राफ्ट (मसौदा, प्रारूप)  कहलाता है|
  • जब से भी संतुष्ट हो जाती है तो वह उस DHRP (Draft red herring prospectus) को अप्रूव कर देती है| 
  • सेबी से अप्रूवल मिलने के तुरंत बाद DHRP – RHP में बदल जाता है| 

नोट:- किसी भी कंपनी को पब्लिक इश्यू लाने के लिए सबसे बड़ा डॉक्यूमेंट RHP ( Red Herring Prospectus) होता है|

जब तक DHRP सेबी से अप्रूव होकर RHP में नहीं बदल जाता तब तक कोई भी कंपनी IPO नहीं ला सकती|

नोट: किसी भी कंपनी के कुछ तथ्य छुपाने के बाद भी SEBI उस पर कार्रवाई कर सकती है चाहे वह कंपनी लिस्ट ही क्यों ना हो चुकी हो!!

नोट: सेबी की मंजूरी के 1 साल के भीतर आईपीओ लाना पड़ता है परंतु सेबी से मंजूरी मिलने में कितना भी समय लग सकता है| 

आईपीओ लाने की तारीख कौन तय करता है?

सेबी से अप्रूवल मिलने के बाद अगले दिन ही कोई भी कंपनी आईपीओ ला सकती है|

 मर्चेंट बैंकर तथा कंपनी के प्रमोटर द्वारा यह तय किया जाता है कि उन्हें IPO कब लाना है|

अब आप डायरेक्टर्स की भर्ती तथा डायरेक्टर्स के काम के बारें में कन्फ्यूज़ मत होइए|

डायरेक्टर्स का काम कंपनी को चलाना होता है| 

आईपीओ तीन कामकाजी दिनों के लिए खुला रहता है|  यानी कि उसमें कोई छुट्टी नहीं गिनी जाएगी| 

IPO की कीमत कैसे तय होगी: प्राइस बैंड क्या होता है? 

पहले फिक्स प्राइस इशू आते थे परंतु अब शेयर की प्राइस बैंड तय करना होता है|

प्राइस बैंड का अर्थ है की – “शेयर की मैक्समम तथा मिनमम वैल्यू कितनी होगी?”

अब भी आ सकते हैं परंतु सेबी का कहना है कि “लोगों को ही तय करने दीजिए कि आपकी कंपनी की वैल्यू क्या है?

सेबी कहती है कि आप लोगों को एक अंदाजा दे दीजिए कि हमारे हिसाब से यह वैल्यू होनी चाहिए” यह अंदाजा ही प्राइस बैंड होता है|

इसका निर्णय मर्चन्ट बैंकर तथा प्रमोटर मिलकर लेते हैं|

उदाहरण 

मान लीजिए आपको लगता है आपकी कार की कीमत मुझे 80 हजार रुपए  बताई है परंतु मुझे उसकी कीमत कम या ज्यादा लग सकती है|

अब  इसमें मेरी मर्जी है कि मैं इस कीमत पर आपकी कार खरीद लूं या ना खरीदूँ| 

परंतु इसके लिए मुझे आपके द्वारा डिमांड की गई कीमत का तो पता होना चाहिए|

इसी प्रकार कंपनियों को एक प्राइस बैंड बताना होता है| 

यह दायरा 20 परसेंट ही फ्लकचुएट करना चाहिए| यानी कि न्यूनतम और अधिकतम कीमत में 20 परसेंट का ही फर्क हो सकता है| 

प्राइस बैंड का फैसला प्रमोटर और मर्चेंट बैंकर द्वारा मिलकर लिया जाता है| 

Anchor investor क्या होता है? 

एंकर इन्वेस्टर्स से मतलब ऐसे निवेशक से होता है जो किसी भी कंपनी में लंबे वक्त तक निवेश करते हैं|

मान लीजिए आप और मैं  किसी कंपनी के आईपीओ में पैसा लगाते हैं|

जैसे ही आईपीओ में शेयर की लिस्टिंग होती है| शेयर की खरीदारी तथा बिकवाली शुरू हो जाती है| आप और मैं वह शेयर बेचकर तुरंत निकल सकते हैं| 

अब एंकर इन्वेस्टर्स के बारे में कुछ तथ्यात्मक बिंदुओं पर चर्चा करते हैं| 

एंकर इन्वेस्टर को एक खास सुविधा दी गई है| 

पहली- तो यह की आईपीओ से दो-तीन दिन पहले एंकर इन्वेस्टर्स को शेयर मिल जाते हैं| इनका अलग से कोटा होता है| 

अब आप सोच रहे होंगे “भाई वाह क्या बात है!!” तो मैं आपके जानकारी के लिए एक बात बता देता हूं कि हम लोग एंकर इन्वेस्टर नहीं बन सकते|

एंकर इन्वेस्टर केवल कुछ संस्थान ही बन सकते हैं जैसे कि:- म्यूचुअल फंड, बैंक,  वित्तीय संस्थान इत्यादि

इनको एक छोटा पोर्शन इसलिए दिया जाता है ताकि लोगों को थोड़ा सा आईडिया मिल सके की  “बड़े इन्वेस्टर्स का इंटरेस्ट इस आईपीओ में है या नहीं?” और” कितना गुना वह बढ़ रहा है?”

दूसरी-  एंकर इन्वेस्टर्स IPO खुलने के बाद 1 महीने से पहले शेयर नहीं बेच सकते| 

नोट: प्रमोटर्स कुछ केस में आईपीओ खुलने के 1 साल बाद तथा कुछ केस में आईपीओ खुलने के 3 साल बाद ही शेयर बेच सकते हैं| 

 यानी कि ऐसा नहीं हो सकता कि IPO खुलने के बाद प्रमोटर अपने शेयर बेचे और निकल लें!! 

छोटे इन्वेस्टर्स को सेफ करने के लिए ही सेबी द्वारा यह नियम बनाया गया है| 

रिटेल इन्वेस्टर्स किसे कहते हैं?

पहले कोई भी व्यक्ति किसी भी पब्लिक इश्यू में पचास हज़ार तक का निवेश करता था वह रिटेल इन्वेस्टर कहलाता था| 

रिटेल इन्वेस्टर की परिभाषा– “अब कोई भी व्यक्ति जो किसी पब्लिक इश्यू में दो लाख रुपए तक का निवेश करता है रिटेल इन्वेस्टर कहलाता है|” 

HNI की परिभाषा– “किसी आईपीओ में दो लाख रुपए से ज्यादा का इन्वेस्ट करने वाले  HNI (High Networth Individual) कहलाते हैं|” 

किसी भी कंपनी द्वारा शेयर को अलॉटमेंट करने की प्रक्रिया होती है| 

IPO FAQs

क्या कोई भी कंपनी आईपीओ ला सकती है?

जी नहीं,  केवल पब्लिक लिमिटेड कंपनी जोकि शेयर मार्केट में लिस्टेड हो केवल वही आईपीओ ला सकती है| 

यदि किसी आईपीओ को पूरे सब्सक्राइबर ना मिले तब क्या होगा?

सेबी के अनुसार आईपीओ की लास्ट डेट तक टोटल सब्सक्रिप्शन के 90% सब्सक्राइबर होने ही चाहिए|  यदि ऐसा नहीं होता तब कंपनी को सभी सब्सक्राइबर्स को उनका पैसा वापस करना पड़ेगा|

ओवर सब्सक्राइब होने पर कंपनी किस प्रकार शेयर अलॉट करती है?

कंपनी द्वारा लॉटरी सिस्टम अपनाया जाता है|

आईपीओ मीनिंग इन हिंदी क्या होता है?

सार्वजनिक प्रस्ताव

कंपनी जब दूसरी बार आम जनता के लिए पब्लिक इश्यू लेकर आती है तो उसको क्या कहते हैं?

पहले ऑफर को आईपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफ्रिंग) कहते हैं दूसरे ऑफर को एपीओ (फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर) कहते हैं|

रेड हियररिंग प्रोस्पेक्टस तथा ड्राफ्ट रेड हियररिंग प्रोस्पेक्टस में क्या अंतर होता है?

 जब तक सेबी द्वारा कोई भी  प्रोस्पेक्टस फाइनल रूप नहीं ले लेता तब तक वह ड्राफ्ट के रूप में रहता है|  यानी फाइनल रूप लेने से पहले रेड हियररिंग प्रोस्पेक्टस को ड्राफ्ट रेड हियररिंग प्रोस्पेक्टस कहते हैं|

क्या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी आईपीओ ला सकती है?

जी नहीं,  यही प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और पब्लिक लिमिटेड कंपनी में सबसे बड़ा अंतर होता है कि  प्राइवेट लिमिटेड कंपनी आम जनता के बीच प्रचार करके अपने शेयर को नहीं  बेच सकती| 

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आपने इस पोस्ट के माध्यम से आपने जाना कि आईपीओ क्या होता है? (What is IPO in Hindi)

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