बिज़नेस करते हैं तो कारखाना अधिनियम को अवश्य समझें | Factories act 1948

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Factories act 1948 भारत के लेबर लॉ का बहुत पुराना तथा महत्वपूर्ण अधिनियम है| शुरुआत के दिनों में जब भारत में औद्योगिक क्षेत्र का काफी तेजी से विकास हो रहा था उस समय कामगारों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी|

जब कामगारों की संख्या बढ़ रही थी उस वक्त फैक्ट्री के मालिकों ने भी उनकी परिस्थितियों पर ध्यान देना बंद कर दिया|

इसका नतीजा यह हुआ कि कई फ़ैक्टरियों में कामगारों को बहुत ही बुरी परिस्थिति में काम करना पड़ रहा था| 

इन मज़दूरों की स्थिति बुरी होती चली गई|

यहाँ तक की इन्हे बुनयादी सुविधाओं से भी वंचित होना पड़ रहा था|

आइए! सबसे पहले इन परिस्थितियों के बारे में जानते हैं कि यह परिस्थितियां किस प्रकार की थी| 

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कारखाना अधिनियम 1948 को बनाने के क्या कारण थे?

किसी भी कानून को बनाने के लिए सबसे पहले उसके कारणों को जानना बहुत जरूरी है| यदि हमें कारण पता चल जाएंगे तो हम उस कानून में बहुत ही अच्छी तरह उनका तालमेल बिठा सकते हैं|

कारण जान लेने के बाद जो कानून बनाया जाता है उसमें उन सारी परिस्थितियों का हल होता है|

 तो चलिए शुरू करते हैं दोस्तों! 

1- ख़राब कामकाजी स्थितियां (Poor working conditions)

इन्हें बहुत ज्यादा खराब परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा था|  मौसम का कुछ भी ख्याल नहीं रखा जाता था| 

बस!! फैक्ट्री मालिक को चाहिए था कि मजदूर काम करते रहें और फैक्ट्री मालिक पैसा कमाते रहें|

2- छुट्टी का दिन (Holiday)

कोई भी छुट्टी का दिन फिक्स नहीं किया गया था| जंगल राज चल रहा था जिस दिन काम करोगे उस दिन पैसा मिलेगा| गरीब आदमी के घर में चूल्हा उसी दिन  जलता था जिस दिन वह काम करता था| 

आज परिस्थिति में थोड़ा सा अंतर यह आ गया है की फैक्ट्री मालिक बोलता है कि “ यदि आप छुट्टी वाले दिन काम करेंगे तो आपको एक्स्ट्रा इनकम हो जाएगी “

ओवर टाइम

काम करने के घंटे भी तय नहीं थे|  काम दे दिया जाता था यदि कर्मचारी उस काम को पहले खत्म कर लेता था तो उसको और काम दे देते थे|  यदि काम जल्दी खत्म नहीं होता था तो उससे पहले काम खत्म करने को कहा जाता था|

कहने का सीधा सा मतलब यह है कि शोषण अपनी चरम सीमा पर था| बस एक चीज की कमी रह गई थी कि फैक्ट्री मालिक इंजेक्शन से मज़दूरों का खून निकाल कर नहीं बेचते थे|

नोट: यह वाक्य मैंने बात की गंभीरता को समझाने के लिए लिखा है| मेरा यह व्यंग केवल उन लोगों के लिए है जो लोग ऐसा करते थे|

3- सुरक्षा और स्वास्थ्य मुद्दे (safety and health issues)

सुरक्षा और स्वास्थ्य इन दोनों की तरफ ध्यान देने का मतलब था पैसे खर्च करना|  भैया!  जब ओवर टाइम कराकर पैसे नहीं देते थे तो सुरक्षा और स्वास्थ्य के बारे में कितने गंभीर होंगे यह आप खुद समझ सकते हैं| 

तब तक किसी भी प्रकार का maternity benefit act, workmen’s compensation act, equal remuneration act नहीं था|

मज़दूरों से खतरनाक जगहों पर बिना किसी सेफ्टी यंत्रों के काम कराया जाता था| 

4- खतरनाक (Hazardous)

वर्करों से ऐसे खतरनाक काम करवाए जाते थे जिनसे कि उनको बहुत ही जल्दी शारीरिक बीमारी लग जाती थी|  दुर्घटना का शिकार हो जाते थे|

उदाहरण: 1- आपने छत में इस्तेमाल होने वाली एस्बेस्टस शीट देखी ही होगी| यह एक तरह के सीमेंट की नालीदार चद्दर होती है|

इसकी प्रोडक्शन के टाइम बहुत सारा धूल का गुबार निकलता है| यह धूल फेफड़ों पर जमकर मेसोथेलियोमा, फुफ्फुस, फेफड़ों का कैंसर, बच्चेदानी का कैंसर  जैसी खतरनाक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं| 

इनको बनाने के दौरान मज़दूरों को ऑक्सीजन मास्क दे दिया जाए तो वह इन लोगों से बच सकते थे|

5- नई फैक्ट्री के लिए नियमों में ढिलाई (Relaxation in rules for new factory)

क्योंकि उस दौरान हमें औद्योगिक क्षेत्र को भी बढ़ाना था|  कृषि क्षेत्र को भी बनाना था| इस कारण से नई फैक्ट्रियों को लगाने के लिए नियम या तो सख्त नहीं थे या फिर उन में ढील दे दी जाती थी|

इसका नतीजा यह हुआ कि फैक्ट्रियों की भरमार हो गई| 

Factories act 1948 का इतिहास 

  • भारत का सबसे पहला फैक्ट्री एक्ट ब्रिटिश फ़ैक्टरी एक्ट के आधार पर बना था| 
  • फैक्ट्री एक्ट की सबसे पहले शुरुआत रॉबर्ट ओवन तथा सर रॉबर्ट पी ने की थी| 
  • इसकी शुरुआत में उन्होंने सबसे पहले औरतों तथा बच्चों के लिए सुरक्षा कानून बनाए थे| 
  • factories act 1948: 1 अप्रैल 1949 को प्रभाव में आया|

कारखाना अधिनियम 1948 को बनाने के उद्देश्य क्या थे?

बहुत तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण के कारण मज़दूरों को बेसिक चीजों का ध्यान नहीं दिया गया| बहुत सारी समस्याओं की तरफ सरकार का ध्यान गया|  

इन बढ़ती फ़ैक्टरियों के कारण औद्योगिक और व्यावसायिक दोनों तरह के संकट जनक परिणाम सरकार को नजर आने लगे| 

इन परिस्थितियों से निबटने के लिए सरकार ने सख्त कानून बनाने का निर्णय लिया| 

सरकार का मुख्य मकसद कामगारों के लिए रोज़गार को सुरक्षित तथा उनकी काम करने की परिस्थितियों को वातानुकूलित बनाना था| 

इस उद्देश्य के साथ सरकार द्वारा factories act 1948 बनाया गया था| इसमें सरकार द्वारा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में काम करने की स्थिति को रेगुलेट किया गया|

फैक्ट्री मालिकों के क्या दायित्व सुनिश्चित किए गए? 

factories act 1948 अधिनियम में कारखाने मालिक के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित कर दिए गए|

इस कर्तव्य के अनुसार यह अनिवार्य कर दिया गया कि कामगारों को ऐसी कंडीशन प्रदान करनी पड़ेगी| जिस कंडीशन में उस कर्मचारी की सेहत तथा सुरक्षा के साथ कोई समझौता ना हो| 

  • श्रमिकों की रक्षा (Workers protection)
  • सुरक्षित रोजगार (Secure employment
  • सुरक्षित पर्यावरण (Safe environment)

फैक्ट्री एक्ट 1948 के अनुसार: फैक्ट्री की परिभाषा

factories act 1948 के अनुसार फैक्ट्री उसे माना जाएगा: 

(i) जिसमे परिसर (premises) तथा अहाते (precincts) में जहाँ पर भी दस या अधिक श्रमिक  पिछले बारह महीनों के किसी भी दिन काम कर रहे हों या काम कर रहे हैं तथा किसी भी हिस्से में बिजली की सहायता से विनिर्माण (manufacturing) प्रक्रिया चल रही हो या आमतौर पर ऐसा किया जाता हो या

(ii) जहां बीस या इससे अधिक श्रमिक काम कर रहे हैं या  पिछले बारह महीनों के  दौरान किसी भी दिन काम कर रहे थे और किसी भी हिस्से में बिजली की सहायता के बिना एक निर्माण (Construction) प्रक्रिया चल रही थी या आमतौर पर ऐसा किया जाता है|

नोट: इसमें खान अधिनियम, 1952 (1952 का XXXV) या संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित एक रेलवे रनिंग शेड  या एक मोबाइल इकाई या एक होटल, रेस्त्रां या खाने की जगह को फैक्ट्री नहीं माना जाएगा|

(iii) राज्य सरकार को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी भी संस्थान को चाहे उसमें दो या तीन व्यक्ति ही क्यों ना कार्यरत हों उसको फैक्ट्री घोषित कर सकती है| 

नोट: किसी जगह पर एक ही फैमिली के 13 लोग काम कर रहे हैं तो उसे फैक्ट्री नहीं माना जाएगा| 

फैक्ट्री एक्ट 1948 के अनुसार: कामगार (Worker) की परिभाषा

factories act 1948 को समझने के लिए हमें वर्कर की परिभाषा भी जरूर पता होनी चाहिए|  परंतु उससे पहले हमें यह पता होना चाहिए कि वर्कर कितने प्रकार के हो सकते हैं?

वर्कर चार प्रकार के हो सकते हैं: बच्चा (Child), वयस्क (adult), किशोर (adolescent), युवा ( young person)

बच्चा (Child) की परिभाषा:  “जिसने 15 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं की है|”

वयस्क (adult) की परिभाषा: “जिसने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है|”

किशोर (adolescent) की परिभाषा: “जिसने 15 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है परंतु 18 वर्ष की आयु का नहीं हुआ है|”

युवा ( young person) की परिभाषा: “या तो एक बच्चा या एक किशोर|” 

कामगार (Worker) की परिभाषा: “फैक्ट्री एक्ट 1948 के अनुसार वर्कर ऐसे व्यक्ति को माना जाएगा जो की संस्थान के मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ हो| चाहे वह इस मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में कार्यरत हो अथवा इस मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस से संबंधित किसी कार्य में कार्यरत हो|” 

फैक्ट्री एक्ट 1948 के अनुसार: दिन (Day) तथा सप्ताह (Week) की परिभाषा

इस एक्ट को अच्छी तरह समझने के लिए  हमें दिन तथा सप्ताह की परिभाषा भी पता होनी चाहिए| 

दिन (Day) की परिभाषा: “मध्य रात्रि (रात 12:00 बजे) से दिन की शुरुआत होगी तथा 24 घंटे का दिन माना जाएगा|” 

सप्ताह (Week) की परिभाषा: “सप्ताह की शुरुआत शनिवार मध्य रात्रि (रात 12:00 बजे) से शुरू मानी जाएगी|” 

कारखाना अधिनियम में खतरनाक प्रक्रिया (hazardous process) किसे माना जाएगा?

factories act 1948 के अनुसार हजार्ड्स प्रोसेस में उधोग से संबंधित ऐसी प्रक्रिया या क्रियाकलाप जिनकी चर्चा अनुसूची में है| 

इनके कच्चे सामग्री के रखरखाव, द्वि-उत्पाद (bi-product), कचरे के प्रति विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है|

ऐसे क्रियाकलाप कामगारों या संबंधित लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होते हैं और साथ ही साथ यह पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाते हैं|

उदाहरण:

  • अलौह धातु उधोग, लौह इस्पात उधोग
  • ऊर्जा उत्पादन, कोयला
  • पेट्रोलियम, ज्वलनशील द्रव व गैस
  • सीसा, सीमेंट व अस्बेस्टस उधोग, सिरेमिक
  • बेवरेज, कागज उधोग 
  • कीटनाशक, केमिकल , पेट्रो केमिकल, खाद, दवा 
  • रबर, चमड़ा, रंग उधोग
  • मानव निर्मित फाइबर, प्लास्टिक
  • पत्थरों के ऊपर की गई कारीगरी 

फैक्ट्री एक्ट के अनुसार फैक्ट्री में सेहत से जुड़े क्या-क्या कार्य करने अनिवार्य हैं?

factories act 1948: Section 11 to 17

  • Setion-11:  फैक्ट्री का फर्श हफ्ते में एक बार अच्छी तरह साफ किया जाना चाहिए|
  • दीवारों तथा छत को 5 साल में एक बार पेंट करवाना अनिवार्य है| वाटर पेंट के साथ हर 3 साल में पेंट करना अनिवार्य है| 
  • इन दीवारों तथा छतों को हर 14 महीने में साफ करना भी अनिवार्य है|
  • दरवाज़ों तथा खिड़कियों को भी हर 5 साल के बाद दोबारा पेंट करना अनिवार्य है|
  • Section -12: अपशिष्ट (Waste) का निपटान पूर्वक किया जाना चाहिए|
  • Section -13: वायु-संचार (ventilation) तथा तापमान (temperature) का ध्यान रखना चाहिए| 
  • Section -14: धूल और धुएँ की निकासी का प्रबंध ठीक तरह से हो| 
  • Section -15: कृत्रिम आर्द्रीकरण (artificial humidification) जब वातावरण बहुत अधिक शुष्क (Dry) हो जाता है तब वातावरण में आस-पास की सामग्री जैसे फर्नीचर, कागज, फल, जानवर और यहां तक ​​कि लोगों से भी नमी आ जाती है|
  • Section -16: एक व्यक्ति को कम से कम 9.9 m3 कार्य करने के लिए मिलना ही चाहिए| यदि किया जाने वाला कार्य पर से 4.2 मीटर ऊपर है तब वहां पर एक से अधिक व्यक्ति कार्य कर सकते हैं| 
  • Section -17:  साफ पीने के पानी की सुविधाएँ होनी चाहिए| साफ  शौचालय की सुविधाएँ होनी चाहिए| थूकदान व्यवस्था भी होनी चाहिए 

फैक्ट्री एक्ट के अनुसार फैक्ट्री में सुरक्षा से जुड़े क्या-क्या कार्य करने अनिवार्य हैं?

  • खतरनाक मशीनों को इस प्रकार से कवर किया जाना चाहिए कि उस पर कार्य करने वाले व्यक्ति के लिए जोखिम ना रहे|
  • मशीनरी के नट बोल्ट समय-समय पर टाइट करते रहना चाहिए|
  • खतरनाक मशीन के आसपास का फर्श चिकना नहीं होना चाहिए|
  • जरूरत से ज्यादा भारी वेट मशीन पर नहीं होना चाहिए|
  • खतरनाक गैसों पर काम करते समय सेफ्टी उपकरण जरूर होना चाहिए|
  • आग से बचाव के उपकरण होने चाहिए|
  • यदि कोई ऐसा कार्य है जहां पर  आंखों को नुकसान पहुंच सकता है तो आंखों के बचाव के लिए उपकरण होने चाहिए|
  • अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थों  का रखरखाव ठीक प्रकार से किया जाना चाहिए|
  • मशीन के साथ-साथ बिल्डिंग की सुरक्षा भी होनी चाहिए| 
  • जहां पर भी 1000 या इससे अधिक  कर्मचारी काम करते हैं वहां पर एक सेफ्टी ऑफिसर की तैनाती  करना अनिवार्य है| इस सेफ्टी ऑफिसर की योग्यता राज्य सरकार द्वारा तय की जाएगी|
  • किसी भी दुर्घटना की सूचना मैनेजर को या फिर संबंधित विभाग को देना अनिवार्य है|

फैक्ट्री में कल्याण (Welfare) से जुड़े क्या-क्या कार्य करने अनिवार्य हैं?

  • धुलाई की सुविधा होनी चाहिए|
  • कपड़ों को सुखाने और रखने की जगह होनी चाहिए| 
  • बैठकर आराम करने की जगह होनी चाहिए|
  • प्राथमिक चिकित्सा सुविधाएँ होनी चाहिए|
  • प्रत्येक 150 कर्मचारियों पर एक फ़र्स्ट एड बॉक्स होना चाहिए|
  • इस फ़र्स्ट एड बॉक्स को देने के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति उपलब्ध होना चाहिए| व्यक्ति राज्य सरकार द्वारा प्रमाणित  होना चाहिए| यह व्यक्ति कार्य-समय में उपलब्ध होना चाहिए| 
  • 500 वर्कर से ज्यादा होने पर एंबुलेंस की सुविधा होने चाहिए| 
  • 150 कर्मचारियों से ज्यादा होने पर आराम गृह ( Rest rooms) , भोजन करने का कमरा (Lunchroom) तथा आश्रय स्थल (Shelter) होना चाहिए| 
  • 250 कर्मचारियों से ज्यादा होने पर भोजनालय (canteen)  की सुविधा करना अनिवार्य है|
  • 30 से ज्यादा महिला कामगारों के होने पर शिशु गृह (Creches) की सुविधा देना अनिवार्य है|
  • 500 तथा इससे ज्यादा वर्कर के होने पर एक वेलफेयर ऑफिसर का होना जरूरी है|

इस वेल फेयर ऑफिसर की  ड्यूटी,  क्वालिफिकेशन तथा कंडीशन स्टेट गवर्नमेंट के द्वारा निर्धारित की जाएंगी|

factories act 1948: वयस्क श्रमिकों के काम के घंटे (working hours of adult workers)

Daily HoursWeekly hoursSpreadoverOvertime in quarterRest interval
सामान्य परिस्थिति (General condition)9 घंटे48 घंटे10:30 घंटे कम से कम आधा घंटा 
छूटने वाले व्यक्ति (exempting persons)Supervisor, manager, Confidential persons10 घंटे60 घंटे12 घंटेतिमाही में अधिकतम 100 घंटे 
काम का असाधारण दबाव (exceptional pressure of work)12 घंटे60 घंटे 13 घंटे115 घंटे 
factories act 1948: Working hours table

नोट:1- जनहित कार्यों में 1 महीने में ओवर टाइम को 125 घंटे तक किया जा सकता है| 

2-किसी भी वर्कर से एक बार में लगातार 5 घंटे से अधिक काम नहीं करवाया जाएगा| 

3- अधिकतम 5 साल के समय के उपरांत इन नियमों में परिवर्तन लाया जाता है| 

महिलाओं के लिए अतिरिक्त प्रतिबंध

1- आमतौर पर महिलाओं के कार्य करने का समय सुबह 6:00 बजे से शाम को 7:00 बजे तक रखा गया है| 

2- राज्य सरकार द्वारा महिलाओं को सुबह 5:00 बजे से रात को 10:00 बजे तक काम करने की इजाज़त मिल सकती है| इस स्थिति में महिला को उसके घर से लाने तथा घर तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी फैक्ट्री मालिक की होगी| 

3- केवल मछलियों की देखभाल के कार्य के लिए महिलाओं को रात में कार्य करने की इजाज़त राज्य सरकार द्वारा दी जा सकती है| 

नोट: साप्ताहिक अवकाश के बाद ही किसी कर्मचारी की कार्य करने की शिफ्ट को चेंज किया जा सकता है| 

factories act 1948: बाल श्रमिकों के काम के घंटे (working hours of child workers)

  • सामान्य 4.5 घंटे 1 दिन में काम करवा सकते हैं| 
  • रात में कार्य करवाना निषेध है|
  • सुबह 6:00 बजे से रात को 10:00 बजे तक ही काम करवा सकते हैं|
  • Spreadover में केवल 5 घंटे ही काम करवाया जा सकता है|
  • किसी और ग्रुप में केवल 30 दिन बाद ही स्थानांतरित किया जा सकता है|
  • बाल श्रमिकों से केवल दो शिफ्ट में ही काम करवाया जा सकता है| 

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 अगली पोस्ट में फिर मिलूंगा तब तक के लिए नमस्कार|

 धन्यवाद

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